इनाम का चस्का

MeenalSonal
Fri 04, 2026

बरगद के पुराने पेड़ पर हर सुबह चहचहाहट का एक मेला लगता था। चिड़ियों का झुंड पास के खेतों से दाने चुगकर लौटता, और फिर दिन भर अपने-अपने काम में लग जाता। उनमें एक चतुर गौरैया थी, छोटी, फुर्तीली, और कुछ अलग तरह की सोच रखने वाली।

एक दिन गाँव के बूढ़े किसान ने अपने आँगन में मुट्ठी भर दाने बिखेर दिए। दाने साफ, चमकदार और आसानी से मिल जाने वाले थे। गौरैया ने देखा, चोंच में भरकर खा लिया। उसे लगा, “इतनी मेहनत किसलिए, जब यहाँ बिना खोजे सब मिल रहा है?”

अगले दिन वह फिर वहीं आ गई। अबकी बार दाने थोड़े ज्यादा थे। उसने जल्दी-जल्दी खाए और लौट आई। धीरे-धीरे उसकी आदत बदलने लगी। अब वह खेतों की ओर कम जाती, और आँगन की ओर ज्यादा।

बाकी चिड़ियाँ पहले तो हँसीं, “आजकल बड़ी आरामतलब हो गई हो।”
गौरैया मुस्कुराकर रह जाती, “तुम भी आ जाओ, वहाँ सब आसान है।”

कुछ दिन बाद, किसान ने दानों के साथ एक छोटी-सी टोकरी भी रख दी, जिसके नीचे पतली-सी लकड़ी टिकी थी। दाने उसके अंदर भी थे। गौरैया ने एक पल को ठिठककर देखा, फिर सोचा, “इतना अच्छा मौका बार-बार कहाँ मिलता है।”

वह टोकरी के भीतर चली गई।

जैसे ही उसने चोंच झुकाई, लकड़ी खिसक गई और टोकरी धप्प से गिर पड़ी। बाकी चिड़ियाँ पेड़ से देखती रह गईं। कुछ देर तक भीतर फड़फड़ाहट होती रही, फिर सब शांत हो गया।

अगली सुबह, वही आँगन फिर दानों से भरा था। चिड़ियाँ आईं, पर इस बार उनकी चहचहाहट में पहले जैसा उत्साह नहीं था। एक बुजुर्ग चिड़िया धीरे से बोली, “दाना वही है, पर रास्ता बदल गया है।”

किसी ने जवाब नहीं दिया। सबने थोड़ा-थोड़ा खाया, और जल्दी ही उड़ गईं।

पेड़ पर लौटकर भी देर तक कोई कुछ नहीं बोला। हवा चल रही थी, पत्ते हिल रहे थे, पर चहचहाहट जैसे कहीं खो गई थी।

उस दिन के बाद, चिड़ियाँ फिर खेतों की ओर जाने लगीं। दाने कम मिलते थे, पर तलाश अपनी थी। उड़ान थोड़ी लंबी थी, पर आसमान खुला था।

और आँगन में बिखरे दाने…
अब भी हर सुबह चमकते थे, बस उन्हें देखने वाली निगाहें बदल गई थीं।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

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