आज का दिन नानू के लिए बहुत ख़ास था, सुबह से ही कुछ अलग ही समां घर में दिख रहा था जैसे पता नहीं कोई खुशी की बात हो। रोज़ की तरह नानी सुबह-सुबह चाय की चुस्कियां ले रही थीं, और नानू की खुशी का राज तो वो भली-भांति जानती थीं, आख़िर छः महीने से जो आता था।

नानू हर बार की तरह नाई की दुकान जाने की तैयारी में थे। वे बहुत सारा समय निकाल कर ही नाई की दुकान पर जाया करते, क्योंकि वहाँ लंबी लाइन होती और करीब एक घंटा तो आम बात थी।

नानू को देख नानी उन्हें चिढ़ाती, “आपके गिने चुने चार बाल काटने में नाई को इतना कितना टाइम लगता है?

नानू हँसते हुए बोले, “ये चार बाल नहीं हैं, मेरी शान हैं, हर किसी के बस की बात नहीं! कहीं एक भी कम-ज्यादा हो गया तो स्टाइल बिगड़ जाएगा।”

नाई की दुकान कोई ज़्यादा फैंसी नहीं थी। एक लाइन से लगी चार लाल रंग की कुर्सियां, सामने बड़ा सा आईना जिसे हर थोड़ी देर में चमकाया जाता था, और दूसरी तरफ दीवार पर टंगे फिल्मी हीरो के पोस्टर, जिनके हेयरस्टाइल देखकर ही लगता था कि यहाँ स्टाइल का मतलब कुछ अलग ही है।

नानू हर बार की तरह आराम से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। दुकान में बैठे बाकी लोग भी अपने-अपने किस्सों में लगे हुए थे। कोई राजनीति पर चर्चा कर रहा था, तो कोई अपनी चिंता में डूबा था। बीच-बीच में रेडियो पर पुराने गाने बज रहे थे, और नाई बड़े ध्यान से किसी के बालों को ऐसे तराश रहा था जैसे कोई कलाकार मूर्ति बना रहा हो।

तभी एक मज़ेदार घटना हो गई।

दुकान में बैठे एक आदमी की बारी आई और उसने नाई से कहा, “मुझे बिलकुल हीरो जैसा हेयरकट चाहिए।”
नाई ने भी बड़े आत्मविश्वास से सिर हिलाया और काम में लग गया। थोड़ी देर बाद जब कटिंग पूरी हुई, तो आदमी ने आईने में खुद को देखा और उसका चेहरा उतर गया।

“अरे! ये क्या कर दिया?” उसने घबराकर कहा।
नाई बोला, “आपने हीरो जैसा कहा था मैंने अपने हिसाब से बना दिया!”

यह सुनते ही दुकान में बैठे सभी लोग ठहाके मारकर हँस पड़े। नानू भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। उन्होंने मज़ाक में कहा, “भाई, यहाँ हीरो बनने का रिस्क मत लो, जो है उसी में खुश रहो!”

आखिरकार नानू की बारी आई। नाई ने उन्हें देखते ही मुस्कुरा कर कहा, “आइए, आज तो खास तैयारी करनी पड़ेगी।”
नानू ने गर्व से कहा, “हाँ भाई, मेरे बाल कोई मामूली नहीं हैं।”

नाई ने बड़े ध्यान से काम शुरू किया, पहले कंघी से हर बाल को सही जगह पर जमाया, फिर कैंची से धीरे-धीरे ट्रिम करने लगा। कभी आगे से देखता, कभी पीछे से, जैसे कोई कलाकार अपनी सबसे कीमती पेंटिंग बना रहा हो।

करीब आधे घंटे बाद नाई ने कहा, “लो जी, हो गया आपका स्पेशल हेयरकट।”

नानू ने आईने में खुद को देखा और चेहरे पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान आ गई। सच में, उनके बाल इतने सलीके से सेट थे कि लग रहा था जैसे हवा भी उन्हें बिगाड़ने से पहले इजाज़त लेगी।

दुकान से निकलते हुए नानू की चाल-ढाल ही बदल गई थी, थोड़ा सीना तानकर, थोड़ा गर्दन ऊँची करके रवाना हो गए। घर पहुँचते ही नानी ने देखा और मुस्कुराते हुए बोली, “वाह! आज तो बड़े हैंडसम लग रहे हो, चारों बाल सही सलामत हैं!”

नानू हँसते हुए बोले, “देखा, कहा था ना, हर किसी के बस की बात नहीं है!”

घर में फिर वही सादगी भरा माहौल लौट आया, लेकिन आज नानू के चेहरे की खुशी कुछ अलग ही थी। छोटे-छोटे लम्हों में छुपी यही खुशियाँ ही तो उस ज़माने की असली दौलत थीं, जहाँ एक साधारण-सा हेयरकट भी पूरे दिन को ख़ास बना देता था।

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खिड़की के पास बैठी ललिता की आंखों में हल्की सी चमक थी। सामने प्याली में बची आधी चाय से उठती हल्की भाप में जैसे कोई पुरानी याद घुल रही थी। वो चुपचाप उस प्याली को देख मुस्कुरा रही थी, लेकिन उस मुस्कान में गहराई थी, एक बचपन के एहसास की।

दिव्या बिस्किट की ट्रे लेकर आई और माँ की आंखों में डूबी उस चुप्पी को भांपते हुए बोली, “माँ, आज कुछ अजीब सा याद आ रहा है ना?”

ललिता इंकार नहीं कर पाई, आखिर उसके हाथ में आधी प्याली चाय जो बची हुई थी।

"तूने चाय पी ली?"

हाँ माँ, आधी प्याली ही तो थी मेरी, जो जल्दी ही खत्म हो गई, वैसे तो आप भी चाय गर्म ही पीते हो पर आज पता नहीं आपका मन कहाँ लग गया।

ललिता धीरे से मुस्कुराई, "मेरा मन तो आधी प्याली चाय में ही है।"

दिव्या कुछ समझ नहीं पाई और अपनी माँ को प्रश्न भरी आंखों से देखने लगी।

ललिता जानती थी कि अब ये पूरा किस्सा सुनकर ही मनेगी।

“तू सुन… आज एक किस्सा सुनाऊं।”


“मैं तब करीब 10 साल की थी। गर्मियों की छुट्टियाँ थीं और हम सब नानी के घर जमा थे। नानी का घर मतलब हँसी, शोर और ढ़ेर सारी कहानियाँ।

उन्हीं दिनों, हर दूसरे या तीसरे दिन एक ग्वालिन दूध लेकर आती और साथ में पूरे मोहल्ले की खबरें भी साथ लाती। उनका नाम आशा था।

”सभी घर की औरतें भी ऐसे उसका इंतजार करती जैसे कि कुछ नया बता देगी और यही नहीं कभी-कभी कुछ बातों की पुष्टि भी वही करती।"

"ओ …तो वो सरला मौसी की तरह थी…", दिव्या को अपनी माँ को चिढ़ाने में बहुत मज़ा आ रहा था।

"चुपकर…अब सुन", ललिता बिना रुके बात बताने लगी।

“आशा मौसी जब आतीं, तो मासी हमेशा उन्हें चाय के लिए कहतीं। और उनका वही जवाब – ‘अभी नहीं… चलो तुम कह रही हो तो आधी प्याली पी लूंगी।’ जैसे उनके होंठों पर यह लाइन सिली हुई हो।”

“हम बच्चे दरवाज़े के पीछे छिपकर उनकी नकल करते, 'आधी प्याली चाय' और खिलखिलाकर हँसते। लेकिन तब नहीं जानते थे कि इन शब्दों में कितनी गहराई छिपी है।”

माँ…आप भी…

"कहा तो तुम्हे मैं 10 साल की थी जब,

आशा मोहल्ले के किस्से बहुत ही आनंद के साथ बताती थी और जब तक उसकी आधी प्याली चाय बनकर आती थी और जब तक वह चाय पीती थी जब तक सबका मनोरंजन भी हो जाता था। लेकिन यह सब आधी प्याली चाय के चक्कर में था।

जब एक दिन मेरे भैया ने मौसी से पूछ ही लिया, ये आशा मासी आधी प्याली चाय ही क्यों पीती हैं? क्या उन्हें हमारे घर की चाय पसंद नहीं? और हर बार मना करते हुए कहती है अगर बना रहे हो तो ही आधी प्याली पी लूंगी।

मौसी ने जो जवाब दिया, वो उस दिन से मेरे दिल में बस गया।”


ललिता की आँखें नम हो गई।

“मौसी बोलीं, ‘आशा अपने लिए चाय नहीं मांगती, वो कहती है अगर बन रही हो तो दे देना… आधी प्याली। ताकि किसी पर बोझ न बने। उसे पता है उसे और घरों में भी जाना है, वहां भी कोई उसका इंतज़ार कर रहा होगा… वो जानती है, उसकी चाय से ज़्यादा उसकी बातें सबको जगा देती हैं।'”

एक गहरा सन्नाटा ललिता की बातों के साथ कमरे में छा गया।

“तो बेटा… ये जो आधी प्याली चाय है न, वो आदत नहीं है… वो अपनापन है, सम्मान है, रिश्तों को हल्के से जीने की कला है। किसी की जगह लिए बिना, फिर भी दिलों में बस जाने की खूबसूरत अदा है।”


दिव्या की आंखें भी नम हो गईं। वो मुस्कुराई, “माँ, आपकी चाय तो ठंडी हो गई… चलिए, मैं फिर से बना लाती हूँ … इस बार आधी-आधी प्याली… आशा मौसी के नाम।”

ललिता ने हौले से सिर हिलाया, “हाँ, और मीठी थोड़ी कम रखना… जैसे आशा मौसी पीती थीं।”

ललिता मुस्कुरा दी, जैसे यादों की वो आधी प्याली फिर से भर गई हो। दिव्या रसोई की ओर चाय बनाने चली गई और घर में फिर से अदरक की खुशबू घुलने लगी।

इतने में ललिता ने अपनी दीदी को संदेश भेजा, "दीदी, आशा मौसी कैसी हैं? आज बहुत याद आईं…कभी बात नहीं हुई, उनका हाल बताना…" और मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें टिक गईं।

चाय बनकर आई, दो छोटी प्यालियों में आधी भरी हुई, एक ललिता के हाथ में और दूसरी दिव्या के। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में मुस्कुराते हुए चाय की चुस्की ली और फिर वही पुरानी नकल, "चाय… अभी तो नहीं, चलो तुम कह रही हो तो आधी प्याली पी लूंगी…" और दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

इस अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस, एक प्याली चाय अपनों के साथ ज़रूर बाँटिये, फिर चाहे वो आधी ही क्यों न हो। क्योंकि कभी-कभी रिश्तों की गर्माहट, एक प्याली चाय में ही बस जाती है। कभी-कभी आधी प्याली चाय, किसी रिश्ते का पूरा एहसास दे जाती है… और बहुत कुछ सिखा जाती है।

गुस्सा एक साधारण सी बात को उलझा देता है। गुस्से पर काबू रखना कठिन है किंतु नामुमकिन नहीं। गुस्सा एक तीव्र अभिव्यक्ति है जिसको कई लोग छुपा नहीं पाते और छोटी - छोटी बात पर लाल पीले हो जाते हैं। अक्सर, गुस्सा एक साधारण सी बात को बहुत बड़ा बना देता है। महात्मा गांधी जी का यह कहना है कि मूर्ख मनुष्य क्रोध को जोर-शोर से प्रकट करता है, किंतु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है। 

आप यह सोच रहे होंगे की मैं गुस्से पर बातें क्यों कर रही हूँ। दरअसल, इसी बात पर एक बहुत ही अद्भुत किस्सा आपको बताना चाहती हूँ। इसके बारे में मैंने कहीं पढ़ा था और मुझे यह बहुत ही प्रेरणादायक लगा। 

एक बार गांधी जी अपने दफ्तर में बैठे कुछ लिख रहे थे। यह उनका रोज का नियम था और दिन भर में उनसे बहुत सारे लोग किसी न किसी काम से मिलने आया करते थे। गांधी जी के समक्ष कोई अपनी परेशानी लेकर आता तो कोई कुछ प्रस्ताव लेकर।

एक दिन एक व्यक्ति बड़ी जल्दी में रिक्शे से उतरा और तमतमाता हुआ गांधी जी के दफ्तर के कक्ष की ओर बढ़ने लगा। उसके हाथ में एक लाल रंग की फाइल थी। उस व्यक्ति ने आव देखा न ताव और कक्ष के दरवाजे को ज़ोर से धक्का देकर गांधी जी के कमरे में घुस गया। उस आदमी को कोई बात खटक रही थी और अपनी बात रखने के लिए वो वहाँ जा पहुँचा।

गांधी जी के पूछने पर उसने कुछ बोले बिना लाल फाइल में से कुछ पन्ने गांधी जी के समक्ष रख दिए। गांधी जी ने उन पन्नों पर ध्यान नहीं दिया और वापस लिखने बैठ गए। अब उस व्यक्ति का गुस्सा उबाल पर था, वो गांधी जी को खरी खोटी सुनने लगा। गांधी जी बड़े ही शांति से उसकी बातें सुन रहे थे, उन्होंने अपने मुँह से एक शब्द भी नहीं निकाला।

गांधी जी ने उसके दिए हुए पन्नों में लगी ऑलपिन को निकाल कर अपने पास रख लिया और सभी कागज लौटा दिए। उस व्यक्ति का पारा और भी चढ़ गया और गांधी जी के ऐसा करने का कारण पूछा। गांधी जी बड़ी सहजता से बोले, "मैंने काम की चीज़ रख ली है बाकी तुम अपने साथ वापस ले जाओ। यहाँ सिर्फ इस ऑलपिन के अलावा मुझे कुछ भी उपयोगी नहीं लगा।"

अगले ही पल उस व्यक्ति को अपने किए का एहसास हो गया। उसे सबक भी मिल गया कि गुस्सा अपनी बात रखने का सही तरीका नहीं है। गुस्से को महत्व कभी नहीं मिलता, गुस्सा प्रतीक है असमंजस का, असंतुलन का, विभ्रान्ति का, इसीलिए उसका कोई मोल नहीं। 

ब्लॉग पर किस्से और कहानियों का आनंद जरूर लीजिये।

संतुष्ट मन सबसे बड़ा वरदान है जिसमें जीवन की सारी खुशियाँ छुपी हैं।

किस्से जो परिवर्तन की लहर आपके अंदर उत्पन्न करें वे बहुत खास होते हैं। हम उन्हें कभी भूल नहीं पाते और वे हमारे प्रेरणा का स्त्रोत बन जाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा आज आपके साथ साझा करना चाहती हूँ ।

एक बार मैं स्कूल के बाहर अपनी गाड़ी में बैठी बैठी मेरी बेटी के आने का इंतजार कर रही थी। मैं थोड़ा जल्दी पहुँच गई थी, रास्ते में और भी काम थे जो जल्दी खत्म हो गए थे, ट्रैफिक भी रोज से कम मिला था। अभी काफी समय बचा था स्कूल की छुट्टी होने में। गाड़ियों की लंबी कतारों ने सभी पार्किंग की जगहों को रोक रखा था। मुझे दूर-दूर तक कहीं भी गाड़ी पार्क करने की जगह नहीं दिखाई दे रही थी। क्योंकि समय अभी काफी बाकी था तो मैंने अपनी गाड़ी स्कूल से थोड़ी दूर एक पेड़ की छाया में लगा दी और पुस्तक पढ़ने लगी।

मेरे बिल्कुल सामने एक बड़ी सी सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी। वो भी पार्किंग की जगह टटोल रही थी। इतने में एक कार की जगह खाली हुई और उस सफ़ेद गाडी वाले ने उस खाली जगह पर कार पार्क कर दी। मैं मन ही मन यह सोचने लगी कि, मेरी तो किस्मत ही खराब है। मैं यहाँ इतनी देर से इंतजार कर रही हूँ, लेकिन मुझे पार्किंग की जगह नहीं मिली और देखो उस गाड़ी वाले की किस्मत आते ही पार्किंग तैयार। कब मिलेगा जो मुझे चाहिए? ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है? जिधर देखो सबके पास आज सबकुछ है लेकिन मेरे पास तो………….तेज हॉर्न की आवाज मुझे अपने ख्यालों से वापस ले आई।

मैने देखा कि उस सफ़ेद कार से दो बच्चे बड़े हँसते खेलते अपनी माँ के साथ उतरे। उनकी माँ ने उन्हें सड़क पार करने से मना किया और उनका हाथ थाम कर एक तरफ खड़ी हो गई। ड्राइविंग सीट से धीरे से एक व्यक्ति उतरे, मुझे ठीक से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि वे दूसरी तरफ थे।

मुस्कुराते हुए जब वे व्यक्ति सड़क पार करने के लिए सामने आए तो मैं चकित रह गई। वे एक पैर से लाचार थे, बैसाखी की सहायता से वे चल पा रहे थे। बड़े ही प्यार से बच्चों ने अपनी माँ और पिता के साथ सड़क पार की और स्कूल के गेट से अंदर चले गए।

यह दृश्य मानो मेरे मन को छू गया। उनको देख मुझे बहुत शर्म आने लगी, अपने आप पर बहुत क्रोध भी आया। अभी थोड़ी देर पहले मैं अपनी किस्मत को कोस रही थी पर आज मुझे पता चल गया कि मैं कितनी गलत थी। शारीरिक रूप से अक्षम हो कर भी वे व्यक्ति कितने संतुष्ट दिखाई दे रहे थे। इतनी विपरीत परिस्थिति में भी उनके चेहरे पर तेज था और आंखों में चमक थी। मुझे यह सीख मिल गई की चाहे कुछ भी हो अपनी उम्मीदों और हौसले को बुलंद रखना चाहिए।

बस, उस दिन के बाद से मैं ईश्वर से संतुष्ट मन और दृढ़ आत्मविश्वास की मनोकामना करने लगी।

क्या आपके साथ भी कोई ऐसी घटना हुई है जिसने आपके नजरिये को बदल दिया हो? अगर हाँ, तो हमसे जरूर शेयर करें।

यहाँ आप पढ़ सकते हैं कि सकारात्मक सोच का जीवन में कितना महत्व है।

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