बरामदे में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी हर शाम की तरह आज भी दादाजी का इंतज़ार कर रही थी। सूरज ढल रहा था, और आसमान के रंग धीरे-धीरे सुनहरे से नारंगी होते जा रहे थे। तभी आँगन में भागते हुए छोटे-छोटे कदमों की आहट गूंजी। “दादाजी!” आरव ने जोर से पुकारा और उनके गले से […]