गणपति बप्पा मोरया! जब यह जयघोष गूंजता है, तो समझ लीजिए खुशियों का सबसे खास त्योहार आ गया है गणेश चतुर्थी
हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। यह दिन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि श्रद्धा, उल्लास, संस्कृति और एकता का प्रतीक है। आज भारत ही नहीं, विदेशों में भी गणेशोत्सव की धूम देखने को मिलती है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ज्ञान और बुद्धि के देवता भगवान गणेश की सवारी आखिर एक नन्हा-सा मूषक क्यों है?
आइए, आज जानते हैं कि गणेश जी की सवारी मूषक के पीछे क्या रहस्य और जीवन-दर्शन छिपा है।

पौराणिक कथा: गणेश जी और मूषक की कहानी

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार एक गंधर्व को श्राप मिला और वह शक्तिशाली मूषक बन गया। उसने ऋषियों की तपस्या भंग करना शुरू कर दिया। जब वह अत्यंत विध्वंसक हो गया, तब भगवान गणेश ने उसे वश में कर लिया और अपनी सवारी (वाहन) बना लिया। यही कारण है कि आज भी गणेश जी की प्रतिमा के साथ मूषक अवश्य दिखाया जाता है।

गणेश जी की सवारी मूषक क्यों? इसके पीछे छिपा जीवन-दर्शन

1. अहंकार पर नियंत्रण – मन रूपी मूषक को वश में करना

मूषक का स्वभाव लालची और चंचल होता है। जैसे मन का अहंकार और इच्छाएँ हमें खोखला कर देती हैं। गणेश जी का मूषक पर बैठना हमें यह सिखाता है कि ज्ञान और सफलता तभी संभव है जब हम अपने अहंकार पर नियंत्रण कर लें।

मन की चंचलता और इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर ही व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।

2. छोटे को बड़ा बनाना – योग्यता नहीं, अवसर ज़रूरी है

गणेश जी का विशाल स्वरूप और उनके नीचे एक छोटा-सा मूषक यह संदेश देता है कि हर छोटा प्राणी भी महान कार्य कर सकता है, अगर उसे सही अवसर और मार्गदर्शन मिले।

किसी को उसकी वर्तमान स्थिति से नहीं, उसकी संभावनाओं से आँकना चाहिए।

3. स्थिरता और गति का संतुलन

गणेश जी का रूप स्थिर और गंभीर है, जबकि मूषक तेज़ और चंचल। यह दिखाता है कि जीवन में स्थिरता और गति दोनों ज़रूरी हैं
सोच में स्थिरता और कार्य में गति का संतुलन ही सफलता की कुंजी है।

जीवन में संतुलन सबसे बड़ी कला है, सोच में स्थिरता और कार्य में गति आवश्यक है।

4. अज्ञान का नाश

मूषक अक्सर अंधेरे में रहता है, जो अज्ञान और भ्रम का प्रतीक है। गणेश जी, जो ज्ञान के देवता हैं, मूषक को सवारी बनाकर यह बताते हैं कि जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ अंधकार मिट जाता है।

जब हम ज्ञान और विवेक से जीवन जीते हैं, तो अज्ञान और भ्रम स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

5. लोभ पर नियंत्रण

मूषक का स्वभाव है हर चीज़ को कुतर लेना, छिपा लेना। यह लोभ का प्रतीक है। गणेश जी का मूषक को वश में करना हमें सिखाता है कि धन और संसाधनों का उपयोग विवेक से करना चाहिए, लोभ से नहीं।

धन-संपत्ति और भौतिक सुखों का उपभोग विवेक से करना चाहिए, लोभ से नहीं।

6. सेवा और समर्पण

मूषक अपने प्रभु को बिना प्रश्न किए हर जगह ले जाता है। यह भक्ति और सेवा-भाव का प्रतीक है। सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं, केवल समर्पण होता है।

जब हम स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देते हैं, तो ईश्वर हमें अपने वाहन बना लेते हैं।

निष्कर्ष: गणेश जी और मूषक से मिलने वाली सीख

अंततः, गणेश जी की मूषक सवारी केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और जीवन-दर्शन की शिक्षा है।
यह हमें सिखाती है कि:

इसी में छिपा है सच्चा ज्ञान और महानता।
इस गणेश चतुर्थी, हम सभी प्रण लें कि हम अपने भीतर के मूषक यानी चंचलता, लोभ और अहंकार पर विजय पाएँगे।

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
गणपति बप्पा मोरया!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: गणेश जी की सवारी मूषक क्यों है?

उत्तर: पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक गंधर्व को श्राप के कारण मूषक का रूप मिला और वह बहुत शक्तिशाली हो गया। भगवान गणेश ने उसे वश में कर अपनी सवारी बना लिया। यह दर्शाता है कि सच्ची बुद्धि और शक्ति का अर्थ है — अहंकार और लोभ जैसे गुणों को नियंत्रण में रखना।


Q2: गणेश जी और मूषक की जोड़ी हमें क्या सिखाती है?

उत्तर: यह जोड़ी हमें सिखाती है कि जीवन में अहंकार, अज्ञान और लोभ पर नियंत्रण जरूरी है। साथ ही, छोटे से छोटा प्राणी या व्यक्ति भी महान कार्य कर सकता है यदि उसे अवसर और सही दिशा मिले।


Q3: मूषक किसका प्रतीक माना जाता है?

उत्तर: मूषक अंधकार, अज्ञान, लोभ और चंचलता का प्रतीक है। गणेश जी जब मूषक को अपनी सवारी बनाते हैं तो यह संदेश मिलता है कि ज्ञान और विवेक से इन कमजोरियों पर विजय पाई जा सकती है।


Q4: गणेश जी की सवारी से हमें कौन-सी जीवन-दर्शन की सीख मिलती है?

उत्तर:


Q5: क्या गणेश जी की मूषक सवारी का संबंध आध्यात्मिक उन्नति से भी है?

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। मूषक मन की चंचलता और इच्छाओं का प्रतीक है। जब व्यक्ति इन्हें वश में कर लेता है, तभी वह सच्चे ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है।

समय को बाँधता मैं हूँ,
अहंकार का नाश मैं हूँ,
सृष्टि की रचना मैं हूँ,
जीवन का संचार मैं हूँ।

काल का काल मैं हूँ,
शून्य का सार मैं हूँ,
निराकार मैं हूँ,
अनंत में मैं हूँ।

तुम्हारे अंतर्मन में मैं हूँ,
तुम्हारे हर प्रयत्नों में मैं हूँ,
हां, मैं शिव हूँ,
मुझे ढूंढो, मुझे समझो,
मैं ही तुम हूँ, तुम ही मैं हूँ।

हाँ, मैं शिव हूँ।


हाँ, यह सत्य तो है कि हम शिव को अनेकों जगह ढूँढ़ते हैं, परन्तु शिव हम में हैं, शिव अनन्त हैं। शिव को समझना जितना मुश्किल है उतना ही आसान भी। शिव की आस्था में जितने दिन लीन हो उतना ही कम है पर महाशिवरात्रि पर भक्तों का समर्पण अपने चरम सीमा पर होता है।

शिवरात्रि एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है जो हमारी आत्मशुद्धि के लिए अति आवश्यक है। शिव जी की साधना और पूजा अर्चना, उपवास व ध्यान की भिन्न भिन्न प्रक्रिया न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह मानसिक और आत्मिक शांति प्राप्त करने का एक तरीका भी है।

इस पावन अवसर पर, हम अपनी नकारात्मक सोच और कुछ आदतों का त्याग कर, अपनी क्षमताओं को पहचान कर, जीवन में सुख और समृद्धि पा सकते हैं।

आइए जानें : शिव कौन हैं? शिव का अर्थ क्या है?

शिव जितने भिन्न हैं उतने ही प्रकृति में समाए हुए हैं, आइए समझते हैं कि शिव और प्रकृति का क्या सम्बन्ध है।

प्रकृति से जुड़ने से कैसे शिव की आराधना होगी

पृथ्वी संतरणात् संतु नः पुन्या पुन्येन वातः।
पुन्येन अध्युष्ट पुन्या पृथ्वी पुन्येन संतु नः॥


हमें अपने पुण्य कार्यों से पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए जो हमारी अपनी भलाई और आने वाली पीढ़ियों की भलाई के लिए पृथ्वी, जल और वायु के संरक्षण के लिए आवश्यक है।

हमारे जीवन में प्रकृति का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जंगल, पहाड़, नदियां, और आकाश प्रकृति के ये तत्व हमें शांति, संतुलन और ऊर्जा प्रदान करते हैं। लेकिन, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में हम प्रकृति से दूर हो गए हैं। हम अपनी आँखों को कंक्रीट के जंगलों में और मस्तिष्क को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उलझा लेते हैं।

महाशिवरात्रि पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति से जुड़ें और अपने समय का कुछ हिस्सा प्रकृति के बीच बिताएं, ताजगी महसूस करें और अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए प्राकृतिक ऊर्जा को स्वीकार करें। प्रकृति की अनगिनत रचनाओं से सीखें और उसे बचाने के लिए पृथक प्रयास करें। इससे हमारे शरीर और मन को शांति प्राप्त होगी।

शांत मन से कैसे शिव में लीन होना

उदेति सविता ताम्र, ताम्र एवास्तऐति च। सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥

जैसे सूर्य का रंग उदय या अस्त होते समय एक समान होता है ठीक वैसे ही हमारा व्यवहार भी सभी परिस्थितियों में समान होना चाहिए।

विचलित मन, जो हर समय अव्यवस्थित रहता है, हमारी मानसिक शांति को भंग करता है। यह एक वास्तविकता की तस्वीर है जिससे हम सब बड़ी आसानी से मुँह मोड़ लेते हैं। हमारी चिंताएँ, विचारों का असंतुलन और बिना उद्देश्य के भटकने वाली मानसिकता हमें आत्मज्ञान और ध्यान से दूर कर देती है।

शिवरात्रि पर ध्यान और साधना से मन को शांत रखना जरूरी है। इस दिन हमें अपने मन को शांत और स्थिर रखने का अभ्यास करना चाहिए। एक व्यवस्थित मन सही निर्णयों को लेने में सक्षम होता है इसीलिए हमें अपने विचारों को नियंत्रण में लाने और चित्त को शांत करने की कोशिश करनी चाहिए।

क्रोध का त्याग इस महाशिवरात्रि पर

नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नवाच्यं विद्यते क्वचित्॥

मनुष्य जब क्रोध में होता है तो उसको क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं बोलना चाहिए इसका विवेक नहीं रहता।

क्रोध एक ऐसी नकारात्मक भावना है जो न केवल हमारे शरीर और मस्तिष्क को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि हमारे रिश्तों को भी तोड़ देती है। जब हम क्रोधित होते हैं, तो हम अपने विवेक और समझ खो देते हैं और ऐसा कुछ कर जाते हैं जिसका पछतावा हमें जीवन भर होता है। इसका एक ही उपाय है, क्रोध से दूरी बनाये रखना। क्रोध को त्यागना एक बड़ी चुनौती हो सकती है, लेकिन शिवरात्रि का यह अवसर हमें इसे नियंत्रण में रखने का आदर्श अवसर देता है।

हमारे भीतर क्रोध को कम करने के लिए, हमें खुद से और दूसरों से क्षमा मांगने की आवश्यकता है। इस दिन को अपने क्रोध को छोड़ने और आत्मा में शांति के लिए ध्यान करने का दिन बनाएं। शिव के ध्यान से यह संभव हो सकता है कि हम अपने भीतर की घृणा, कष्ट और गुस्से को सुलझा सकें।

कैसे अपनी सोच से शिव की आराधना करें

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतो:

सभी दिशाओं से नेक विचार ही मेरे पास आएं

नकारात्मक सोच हमें हर अच्छे अवसर से दूर कर देती है। आप सोच रहे होंगे यह तो कोई नयी बात नहीं है परन्तु, यह साधारण सा बदलाव ही सारे गुणों से सर्वोपरि है। नकारात्मक सोच ही हमारी आत्म-संवेदनशीलता को प्रभावित करती है और हम अपने जीवन के अच्छे पहलुओं को नजरअंदाज कर देते हैं। शिवरात्रि का दिन इस नकारात्मक सोच को छोड़ने का सर्वोत्तम समय है।

हमें अपनी मानसिकता में सकारात्मकता लानी चाहिए और यह समझना चाहिए कि भगवान शिव हमें सही रास्ते पर चलने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। हमें हर कठिनाई को एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। शिवरात्रि पर हम अपने विचारों को सकारात्मक दिशा में बदलने के लिए कदम बढ़ा सकते हैं।

अहंकार से दूरी लाए आपको शिव के समीप

नास्त्यहंकार समः शत्रुः

अहंकार के समान कोई शत्रु नहीं है। अहंकार व्यक्ति को आत्मसमर्पण और स्वीकृति के मार्ग से हटा देता है और उसे अपनी गलतियों को मानने में विफल करता है।

आडंबर और अहंकार व्यक्ति को आत्मसाक्षात्कार से दूर ले जाते हैं। शिवरात्रि का यह पवित्र दिन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति न तो किसी दिखावे और न ही अहंकार से संबंधित होती है। भगवान शिव के प्रति वास्तविक श्रद्धा और प्रेम में कोई आडंबर नहीं होता।

इस दिन हमें अपने अहंकार और दिखावे को छोड़ना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि जो दिखावा हम दूसरों के सामने करते हैं, वह हमें आंतरिक शांति से दूर करता है। शिवरात्रि का दिन हमें अपनी आत्मा को शुद्ध करने का समय प्रदान करता है।

शिवरात्रि पर इन पांच दोषों का त्याग और उनके हल को अपनाने से हम अपने मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं, और यह हमारे जीवन को एक नई दिशा भी दे सकते हैं। जब हम अपनी गलत आदतों और नकारात्मकता से मुक्ति प्राप्त करते हैं, तो हम आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलने में सक्षम होते हैं। शिवरात्रि का यह पर्व हमें अपनी गलतियों को सुधारने और अपने जीवन को शुद्ध करने का अद्भुत अवसर प्रदान करता है।

आइए, हम सब मिलकर इस शिवरात्रि को अपनी आत्मा की शुद्धि और मानसिक शांति के लिए समर्पित करें।

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बसंत पंचमी का त्यौहार भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व सर्दी के मौसम के समाप्त होने और गर्मी की शुरुआत का प्रतीक है। साथ ही, यह ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के पूजा का दिन भी है। बसंत पंचमी का महत्व केवल मौसम बदलने के रूप में नहीं है, बल्कि यह एक संस्कृति, आस्था और विश्वास का पर्व भी है।

बसंत पंचमी की सुबह का दृश्य बहुत ही अद्भुत होता है। जब सूरज की किरणें धरती पर पड़ती हैं, तो चारों ओर पीले फूलों से रंगी हुई धरती एक नया रूप धारण करती है। पीला रंग बसंत का प्रतीक है, जो शुभता और समृद्धि का संकेत देता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं और अपने घरों को सजाते हैं। पीले रंग के कपड़े पहनना खास तौर पर शुभ माना जाता है।

आइये बसंत पंचमी पर कविता द्वारा जानें सरस्वती माता का आगमन कैसा होता है और वे हमें क्या सिखाती हैं।

बसंत पंचमी का पर्व आया, हर दिशा हुई पीतवर्ण।
धरती ने ओढ़ी छटा स्वर्णिम, गूंज उठा प्रकृति का कण कण।
अम्बर में खिली धूप, और हवा में घुली मिठास,
ज्ञान और वाणी देवी माँ सरस्वती, का आगमन बना खास।

माँ सरस्वती की कृपा से हर मन में जगे ज्ञान की ज्वाला,
शब्दों में समाहित हर समस्या का हल और सफलता का प्याला।
मधुर वाणी से ही जीवन में निखार आता,
बसंत पंचमी का यह पर्व यही है सिखाता।

शिक्षा का प्रकाश जब हमारे हृदय में है समाता,
हर विचार और हर शब्द एक नया आयाम पाता।
ज्ञान की ज्योति बन मार्ग दिखाए, हर अंधकार मिटाती,
संस्कार, विवेक, और चेतना की नई किरण जगाती।

शब्दों में शक्ति है, जो जीवन को दिशा दे,
वाणी में है ताकत, जो अंधकार को धूमिल करे|
वाणी की ताकत से जब हम सत्य बोलते हैं,
तो आत्मविश्वास से अपने सपनों को पूरा करते हैं।

आओ, इस बसंत में हम सभी मिलकर वाणीवाग्देवी को नमन करें,
शिक्षा के दीपों से हम हर दिल को रोशन करें।
ज्ञान की गंगा से हम सभी की प्यास बुझाएं,
और वाणी शक्ति से समाज में एक नया अध्याय प्रारंभ करें।

इस दिन को लेकर गाँवों और शहरों में उत्सव का माहौल होता है। लोग एक दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं, घर-घर मिष्ठान्न बनते हैं और सभी मिलकर खुशियाँ मनाते हैं। बच्चों को इस दिन खासकर अपने ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। माँ सरस्वती की पूजा होती है और उन्हें संगीत, कला और साहित्य का आशीर्वाद दिया जाता है।

बसंत पंचमी का विशेष संबंध विद्या से भी है। इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से विद्यार्थी अपनी पढ़ाई में उन्नति प्राप्त करते हैं। उन्हें ज्ञान की देवी का आशीर्वाद मिलता है और उनके मनोबल में वृद्धि होती है। विद्यार्थियों के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वे अपनी किताबों और पेंसिलों को इस दिन पूजा करते हैं, ताकि उनकी पढ़ाई में सफलता मिले।

सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥

देवी सरस्वती को नमन, जो वरदान देने वाली और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हैं।
हे देवी, जब मैं अपनी शिक्षा प्रारंभ करूं, तो कृपया मुझे सदा सही समझ की क्षमता प्रदान करें।

यह भी पढ़ें : सरस्वती माता को वाणी की देवी क्यों कहते हैं?

यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत खास है। यह सब कुछ बताता है कि इस दिन का महत्व केवल एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन के नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक है। बसंत पंचमी का पर्व सर्दी से गर्मी के बीच का एक सुंदर संक्रमण है, जो हमें न केवल मौसम के बदलाव का अहसास कराता है, बल्कि जीवन में नए रंग और खुशियाँ लाने का संदेश भी देता है।

माता सरस्वती की वीणा किसका प्रतीक है?

विद्या कला और वाणी की देवी मां सरस्वती अपनी वीणा से मानो सृष्टि में प्राण का संचार करती है जिससे कण कण में नई ऊर्जा आ जाती है। देवी सरस्वती के हाथों में धारण वीणा कला का प्रतीक है जो हमें सिखाती है कि जीवन में कला का होना उतना ही आवश्यक है जितना पुस्तक से ज्ञान।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदो न यज्ञः |
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहं शिवोऽहम् ||

अर्थात: न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…

शिव कौन हैं ?

शिव आत्म चेतना है, संसार है, निर्गुण है, सर्वशक्तिमान है, शिव संपूर्ण हैं, शिव हर तत्त्व है, शिव सर्वश्रेष्ठ है, शिव में सब विलीन हैं। भगवान शिव के कई नाम हैं। पाताल से लेकर पहाड़ों तक विराजमान शिव जी की महिमा चारों ओर गूंजती है।

शिव अहंकार को हरते हैं: शिव जी हमारे हर प्रकार के अहंकार को समाप्त कर अपनी सकारत्मक ऊर्जा के समीप लाते हैं। वे हमारी अंतरात्मा में वास करते हैं और हमें सही रास्ता दिखलाते हैं। शिव हर उस में समाते हैं जो हर तरह के भेद भाव और आसक्ति से परे हैं।

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषंतोअभ्यसूयकाः।

अर्थ – अहंकार, बल, घमंड, कामना, क्रोध और दूसरों की निंदा, जिनमें ये छह दुर्गुण होते हैं, वे लोग मुझे (ईश्वर) कभी नहीं देख सकते।

शिव कहां हैं ?

शिव शाश्वत हैं, अनंत हैं: शिव शाश्वत हैं, वे ऐसी ऊर्जा हैं जिसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता, जो कभी खत्म नहीं होती। भगवान शिव को दिव्य अंधकार भी कहा जाता है क्योंकि अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं और जिसका कोई स्त्रोत नहीं उसका कोई अंत भी नहीं। शिव शाश्वत हैं, और किसी भी तरह की आसक्ति से परे हैं।

शिव का अर्थ क्या है?

शिव शब्द का अर्थ है, "वह जो नहीं है"। वे निराकार हैं, समय, स्थान और कर्म की द्वैतवादी दुनिया से परे हैं। शिव परम पूज्य हैं, शिव शून्यता की शक्ति हैं। शिव से ब्रह्मांड है, वे सृजन भी करते हैं और विनाश भी; और जो हर चीज़ को अर्थ देते हैं। शिव तथ्य है, शिव अर्थ है। शिव शून्य है, शून्य पूर्ण है, और पूर्ण अनंत होता है। शून्य अनादि है और अनंत भी।

शिव नीलकंठ हैं:

वे भौतिक विष जैसे लोभ, सफलता, श्रेय, तुलना, वासना से परे हैं। जैसे महादेव ने विष को अपने कंठ में इकठ्ठा कर लिया उसी तरह वे सिखाते हैं कि हर प्राणी को ऐसे भौतिक विष को अपने कंठ से भीतर प्रवेश करने नहीं देना चाहिए जिससे सारी इंद्रियां प्रभावित होती हैं। शिव का नीलकंठ रूप यही दर्शाता है कि हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और सकारात्मक भाव को अपनाना चाहिए। शिव का वास माया और मिथ्या से परे मन में होता है।

शिव त्रिनेत्रधारी हैं:

भगवान शिव अपनी ललाट पर स्थित तीसरी आंख से भूत, भविष्य और वर्तमान को देख सकते हैं। वे किसी को भी सही या गलत के मापदंड में नहीं आंकते हैं। शिव जी हमें दिखाते हैं कि हमें अपने अंतर्मन से, और विवेक से हर किसी को देखना चाहिए। भगवान शिव की तीसरी आंख की तरह हमें भी अपने अंतर्ज्ञान और मानसिक क्षमता को अपना साथी बनाकर किसी के लिए भी निर्णयात्मक नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें सदा हर किसी में बसे शिव को ही ढूंढना चाहिए।

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महाशिवरात्रि का क्या महत्व है:

महाशिवरात्रि की रात को ब्रह्माण्ड में ग्रहों और नक्षत्रों की एक अनोखी स्थिति से पूरे ब्रह्माण्ड में प्राकृतिक ऊर्जा का प्रवाह होता है। और इसीलिए महाशिवरात्रि पर हम रात भर जागरण कर इस प्राकृतिक ऊर्जा से अपनी आत्म चेतना को जागृत करते हैं। अपनी चेतना को जागरूक कर हम धारणाओं और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाते हैं और एक सही दृष्टिकोण से चीजों को समझ पाते हैं।

तो आइए महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हम हर एक में बसे शिव के रूप को ही ढूंढे, हमारे अंदर बसी भौतिक वासनाओं का त्याग करें, अपनी आत्म चेतना से अपने विवेक को बढ़ाएं और एक सुंदर मन से सबको अपनाएं।

Shiv ka arth kya hai? Shiv kaun hain?

हमारी प्रकृति अद्भुत है, अनोखी है अनमोल है जो हमें मोहित कर देती है | प्रकृति के बीच मन शांत और ताज़ा महसूस करता है। चिड़ियों के कलरव, कल कल करती नदियां, हवाओं की साएं साएं , फूलों पर भिनभिनाता भौंरा, या तालाब में किनारे टर्र-टर्र करते मेंढक, प्रकृति की हर रचना अपनी एक अद्वितीय ध्वनि से जुड़ी है।

अगर हम शांत मन से सुनें तो प्रकृति से उत्पन्न ध्वनियां हमारे मन को मुग्ध कर देती हैं। किंतु क्या आप जानते हैं यह ध्वनियां आई कहां से, इसका स्त्रोत क्या है?

प्रकृति की धवनि कहाँ से उत्पन्न हुई?

हमारे पुराणों के अनुरूप प्रकृति के रचयिता ब्रह्मा जी हैं। उन्होंने पृथ्वी के जीव जंतुओं को भिन्न भिन्न आकारों में ढाला और संवरा। ऐसा माना जाता है की ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना को देख कर खुश नहीं थे। उन्हें अपनी बनाई हुई श्रृष्टि बहुत सूनी लग रही थी। उन्होंने विष्णु जी से अपनी बात कही तब विष्णु जी ने उन्हें मां सरस्वती की सहायता लेने को कहा।

माँ सरस्वती ने कैसे रची प्रकृति की ध्वनियां:

ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी का आहवान किया और अपनी सहायता करने को कहा। तब माता सरस्वती ने अपनी वीणा से विभिन्न ध्वनियां उत्पन्न की जिससे श्रृष्टि में मधुर ध्वनियों का प्रवाह हुआ। इसी कारण सरस्वती मां को (वाणी की देवी) वाग्देवी भी कहा जाता है। माता सरस्वती सिखलाती हैं कि हमें अपनी वाणी को हमेशा मधुर रखनी चाहिए।

यह भी पढ़ें : कैसे सर्व भूतः शक्ति करती मार्गदर्शन?

बसंत पंचमी को माँ सरस्वती की पूजा क्यों की जाती है ?

वसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। मां सरस्वती वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थी, इसी कारण इस दिन को मां के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मां सरस्वती वाणी, विद्या, ज्ञान-विज्ञान एवं कला-कौशल आदि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। वे मनुष्य को ज्ञान तथा कला के प्रकाश की ओर ले जाती हैं।

“सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम् ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ॥”
– सरस्वती वंदना श्लोक

अर्थ- वाणी की देवी माता सरस्वती जी को नमस्कार, जिनके आशीर्वाद मात्र से मानव देव समान हो जाता है।

बसंत पंचमी या वसंत पंचमी ?

अक्सर देखा गया है कि लोग बसंत और वसंत पंचमी में से क्या सही है इसको समझाना चाहते है , तो देखते है की इन शब्दों में कोई अंतर है या नहीं। बसंत और वसंत दोनों ही सही है, वसंत संस्कृत शब्द है और वही बसंत हिंदी जिसका अर्थ है वसंत ऋतु।

बसंत पंचमी को पीला रंग क्यों पहनते हैं ?

पीले रंग को हिंदू धर्म में एक शुभ रंग माना जाता है और वसंत पंचमी या सरस्वती पूजा के दौरान इसका विशेष महत्व है। पीला रंग देवी सरस्वती से जुड़ा हुआ है क्योंकि यह उनका पसंदीदा रंग है। पीला रंग ज्ञान, समझ और बुद्धिमत्ता का रंग है, जो सभी देवी से जुड़े हुए हैं।

आइए वसंत पंचमी के दिन हम सभी माता सरस्वती से यह आशीर्वाद मांगे की हम सब पर सदा ऐसे ही ज्ञान, वाणी और कला का आर्शीवाद बनाएं रखें और इस कौशल का सही रूप में उपयोग करने की शक्ति प्रदान करें।

आज साहित्य, कला और संस्कृति का हमारे जीवन में बड़ा ही महत्व है जो मानव जीवन को एक सकारात्मक दिशा की ओर केंद्रित करते हैं। यह हमारा पहला लेख है। हमारा प्रयास रहेगा हम साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ी रोचक बातें आपके लिए लेकर आएं।

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