पलटू राम

MeenalSonal
Sat 04, 2026

धर्मपुर गाँव में गौरव को उसके असली नाम से लगभग कोई भी नहीं बुलाता था; अगर आप यह सोच रहे हैं कि लोग उसे इस वजह से ज्यादा इज्जत देते थे, तो ऐसा बिल्कुल नहीं था, बल्कि सच्चाई यह थी कि उसका नाम तो पूरे गाँव ने मिलकर रख दिया था, पलटू राम।

पलटू राम का असली नाम गौरव था, लेकिन गाँव में यह नाम जैसे कहीं खो सा गया था, सिवाय उसके बापू के, जो आज भी उसे उसी प्यार और उम्मीद के साथ “गौरव” कहकर बुलाते थे। बापू अक्सर मुस्कुराते हुए कहते, “गौरव, तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा… बस अपने फैसलों पर टिकना सीख ले, क्योंकि असली ताकत वहीं होती है।”

एक दिन जब गाँव में मेले की घोषणा हुई, तो पलटू राम पूरे उत्साह और आत्मविश्वास के साथ सबके सामने बोला, “इस बार मैं जलेबी की दुकान लगाऊँगा, गरमा-गरम, चाशनी में डूबी हुई, ऐसी कि लोग उंगलियाँ चाटते रह जाएँ!”

बापू ने उसकी बात सुनकर हल्की मुस्कान के साथ कहा,"बहुत अच्छा गौरव, इस बार जो शुरू करे, उसे पूरा जरूर करना।”

लेकिन अगले ही दिन उसका मन फिर बदल गया, और उसने थोड़ी झिझक के साथ कहा, “नहीं बापू, जलेबी नहीं, मैं सोच रहा हूँ कि खिलौनों की दुकान लगाऊँ, बच्चों को ज्यादा पसंद आएगा।”

बापू ने फिर भी उसे रोका नहीं, बल्कि शांत स्वर में बोले, “ठीक है बेटा, जो भी कर, दिल से कर और इस बार बीच में मत छोड़ना।”

तीसरे दिन, बिना किसी झिझक के, उसने फिर नया विचार सामने रख दिया, “अरे, खिलौने भी नहीं, मैं तो झूला लगाऊँगा! सबसे ज्यादा भीड़ उसी में होती है, और कमाई भी सबसे ज्यादा वहीं है।”

इस बार बापू थोड़े शांत हो गए, और उन्होंने गहरी नजरों से उसे देखते हुए बस इतना कहा, “गौरव, काम छोटा या बड़ा नहीं होता, लेकिन इंसान का अपने मन पर टिके रहना बहुत बड़ा होता है।”

असल में बापू की अपनी एक छोटी-सी चाय की टपरी थी, जहाँ वे कई सालों से बिना किसी शिकायत के काम कर रहे थे, सुबह से लेकर शाम तक चाय बनाना, लोगों से बातचीत करना, और उसी में संतोष ढूँढ़ लेना उनकी आदत बन चुकी थी। गौरव को यह सब हमेशा छोटा लगता था; उसे लगता था कि वह कुछ बड़ा करेगा, कुछ अलग करेगा, लेकिन वह यह समझ ही नहीं पा रहा था कि बड़ा बनने के लिए शुरुआत करना और उस पर टिके रहना सबसे जरूरी होता है।

आखिरकार मेला शुरू होने का दिन आ गया, और पूरे गाँव में चहल-पहल फैल गई; हर किसी ने अपनी-अपनी दुकानें सजा ली थीं, कहीं मिठाइयाँ, कहीं खिलौने, कहीं झूले, तो कहीं खाने-पीने के अलग-अलग सामान।

लेकिन पलटू राम, वह खाली हाथ खड़ा था।

गाँव वाले हँसते हुए उसके पास आए और बोले, “क्या हुआ पलटू राम? इस बार क्या बेच रहे हो, हवा?”

वह शर्म से नजरें झुका गया और धीमे स्वर में बोला, “सोचते-सोचते ही समय निकल गया”

बापू दूर खड़े यह सब देख रहे थे; उनके चेहरे पर हल्की निराशा जरूर थी, लेकिन उनकी आँखों में अब भी वही उम्मीद और विश्वास बाकी था।
वे उसके पास आए और बहुत ही शांत लेकिन गहरे शब्दों में बोले, “गौरव, मैं तेरी मदद हमेशा करता रहूँगा, चाहे पैसे से, चाहे हौसले से; लेकिन अगर तू खुद अपने फैसले पर टिकना नहीं सीखेगा, तो दुनिया का कोई भी इंसान तुझे सफल नहीं बना पाएगा।”

उस रात गौरव बहुत देर तक जागता रहा, और पहली बार उसने खुद को ईमानदारी से समझने की कोशिश की; उसे बापू की सालों की मेहनत याद आई, उनका धैर्य, उनका संतोष और अपनी खुद की आदतें भी, जहाँ वह हर बार कुछ शुरू करने से पहले ही हार मान लेता था।

उसने मन ही मन स्वीकार किया, “मैं बड़ा बनना चाहता था लेकिन मैंने कभी सच में शुरुआत ही नहीं की।”

अगली सुबह उसने एक ऐसा फैसला लिया, जिसे इस बार उसने बदलने नहीं दिया।

वह बापू के पास गया और पूरे विश्वास के साथ बोला, “बापू, मैं आपकी चाय की टपरी संभालना चाहता हूँ लेकिन मैं इसे अपने तरीके से थोड़ा बड़ा और बेहतर बनाना चाहता हूँ।”

बापू की आँखों में चमक आ गई, और उन्होंने गर्व से कहा, “यही तो मैं हमेशा से चाहता था, गौरव!”

शुरुआत आसान नहीं थी; कई बार उसका मन फिर डगमगाया, कई बार उसे लगा कि कुछ और कर ले, कुछ बड़ा ढूँढे लेकिन हर बार उसे बापू की वही बात याद आती, “मन का पक्का होना ही सबसे बड़ी बात होती है।”

धीरे-धीरे उसने टपरी में बदलाव करना शुरू किया, नई-नई तरह की चाय, साफ-सफाई पर ध्यान, बैठने की अच्छी व्यवस्था और देखते ही देखते लोगों की भीड़ बढ़ने लगी।

कुछ ही महीनों में उसकी छोटी-सी टपरी पूरे गाँव की सबसे पसंदीदा जगह बन गई, जहाँ लोग सिर्फ चाय पीने नहीं, बल्कि समय बिताने भी आने लगे।

अब भी लोग उसे “पलटू राम” कहकर बुलाते थे, लेकिन अब उस नाम में पहले जैसी हँसी नहीं थी, अब उसमें सम्मान और गर्व की झलक थी।

और बापू? वे आज भी उसे उसी नाम से पुकारते थे, जिसमें सबसे ज्यादा अपनापन था,

“गौरव”

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