टोमैटो भात

कावेरी के किनारे बसा गाँव कुम्भकोणम हर सुबह जैसे मुस्कुराकर उठता था। नारियल के पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप, धान के खेतों में झुकती हवा, और दूर मारीअम्मन मंदिर की घंटियाँ, सब मिलकर दिन की शुरुआत को एक उत्सव बना देते थे।

इसी गाँव में दो दोस्त थे, शिवा और राघवन। दोनों की जोड़ी पूरे गाँव में मशहूर थी। अगर एक हँसता तो दूसरा ज़ोर से हँसता; अगर एक काम करता तो दूसरा बिना बुलाए साथ लग जाता।

एक दिन सुबह-सुबह शिवा की अम्मा रसोई में टमाटर भात बना रही थीं। कढ़ाई में तेल गरम हुआ, सरसों चटकी, करी पत्ते तड़के, और जैसे ही टमाटर डाले गए खट्टी-सी खुशबू पूरे घर में फैल गई।

राघवन भी वहीं आ पहुँचा, जैसे उसे उस खुशबू ने बुला लिया हो। “अम्मा! आज तो कुछ खास बन रहा है,” उसने हँसते हुए कहा।

अम्मा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “हाँ, टमाटर भात और आज तुम दोनों ही इसे बनाओगे।”

दोनों दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे, “हम?” दोनों ने एक साथ कहा।

“हाँ,” अम्मा बोलीं, “देखना है कि दोस्ती का स्वाद कैसा होता है।”

बस फिर क्या था रसोई एक खेल का मैदान बन गई। शिवा चावल धो रहा था, तो राघवन टमाटर काट रहा था, हालाँकि उसके टुकड़े बराबर नहीं थे।

“अरे, ऐसे नहीं!” शिवा हँस पड़ा। “तो तू कर ले!” राघवन ने भी जवाब दिया।

थोड़ी ही देर में दोनों की हँसी, तड़के की आवाज़ और मसालों की खुशबू मिलकर एक नया ही संगीत बना रहे थे।

जब टमाटर गलने लगे, राघवन ने चखा और मुँह बना लिया, “अरे! ये तो बहुत खट्टा है!”

अम्मा हँसीं, “अभी नमक और थोड़ा गुड़ डालो फिर देखो।”

दोनों ने वैसा ही किया। फिर दोबारा चखा इस बार स्वाद बदल चुका था।

“वाह!” शिवा बोला, “अब तो मज़ा आ गया!”

अम्मा ने धीरे से कहा, “देखा? खटास अकेली अच्छी नहीं लगती, पर जब बाकी स्वाद साथ मिलते हैं, तो वही सबसे खास बन जाती है।”

दोपहर को दोनों दोस्त वही टमाटर भात लेकर गाँव के तालाब किनारे बैठ गए। हवा चल रही थी, पानी में आसमान झिलमिला रहा था और उनके हाथ में गर्म-गर्म भात।

“सच बता,” राघवन बोला, “अगर हम दोनों अकेले बनाते, तो इतना अच्छा बनता?”

शिवा ने सिर हिलाया, “नहीं क्योंकि तू खटास है।”

राघवन चौंका, फिर हँस पड़ा, “और तू?”

“मैं नमक,” शिवा बोला।

"और गुड़ हमारी दोस्ती", दोनों ठहाका लगाकर हँस पड़े।

पास ही कुछ छोटे बच्चे खेल रहे थे। शिवा ने उन्हें आवाज़ दी, “आओ, खाओ!”

धीरे-धीरे सब बच्चे आ गए। थोड़ा-थोड़ा भात सबमें बँट गया और अजीब बात यह थी कि किसी को कमी महसूस नहीं हुई।

राघवन ने आखिरी कौर खाते हुए कहा, “आज समझ आया खाना तभी अच्छा लगता है जब बाँटा जाए।”

शिवा ने मुस्कुराकर कहा, “और दोस्ती भी।”

शाम को जब वे घर लौटे, तो अम्मा ने पूछा, “कैसा बना टमाटर भात?”

दोनों ने एक साथ जवाब दिया, “सबसे अच्छा!”, दोनों की आंखों में संतोष था।

उस दिन के बाद गाँव में जब भी टमाटर भात बनता, लोग कहते, “इसमें खटास थोड़ी ज़्यादा हो तो भी कोई बात नहीं, बस दोस्ती साथ होनी चाहिए।”

और सच में उस छोटे-से गाँव में, खटास भी मीठी लगने लगी थी।

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One comment on “टोमैटो भात”

  1. I like that the food preparation and ingredients became a representation of friendship.
    Good post.
    "Starting strong is good. Finishing strong is epic." — Robin Sharma

    J (he/him 👨🏽 or 🧑🏽 they/them) @JLenniDorner ~ Speculative Fiction & Reference Author and Co-host of the April Blogging #AtoZChallenge international blog hop

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