जाने भी दो यारों…

MeenalSonal
Sat 04, 2026

चाय की दुकान के बाहर खड़े होकर रवि ने तीसरी बार वही बात दोहराई,
“यार, सच में… जाने भी दो।”

सूरज अभी थोड़ी देर पहले ढला ही था और हल्की-हल्की बारिश की बूंदें स्ट्रीट लाइट में चमक रहीं थी।

अमित ने कप से उठती भाप को देखते हुए बस इतना कहा, “इतना आसान होता तो शायद हम यहाँ खड़े नहीं होते।”

आज दोनों की बातों के बीच एक गहरी चुप्पी ने जगह बना ली थी।

रवि और अमित की दोस्ती सालों पुरानी थी। कॉलेज में के दिनों से, जहाँ सपने बड़े थे और दुनिया छोटी। तब हर मुश्किल का हल था, एक लंबी बहस, एक कप चाय, और आखिर में वही वाक्य, “जाने भी दो यारों।”

लेकिन आज बात कुछ और थी।

“तूने उससे बात की?” अमित ने धीरे से पूछा।

रवि ने सिर झुका लिया। “नहीं… और शायद अब करूंगा भी नहीं।”

बारिश तेज़ हो गई। जैसे आसमान भी किसी अनकही बात का बोझ हल्का कर रहा हो।

“क्यों?” अमित ने पूछा, इस बार थोड़ा ज़्यादा सीधेपन से।

“क्योंकि हर बार मैं ही क्यों समझाऊँ?” रवि की आवाज़ में थकान थी। “हर बार मैं ही क्यों पीछे हटूँ? कभी तो कोई और भी कहे, ‘जाने भी दो’।”

अमित ने उसकी तरफ देखा। “और अगर वो इंतज़ार कर रही हो कि तू कहे?”

रवि हल्का सा मुस्कुराया, लेकिन उस मुस्कान में दर्द साफ था। “तो फिर हम दोनों ही इंतज़ार करते रहेंगे।”

पास से एक ऑटो गुज़रा, पानी के छींटे उड़ाते हुए। सड़क पर लगी पीली रोशनी में बूंदें चमक रही थीं, जैसे हर एक में कोई कहानी अटकी हो।

“तुझे याद है,” अमित ने अचानक कहा, “कॉलेज का वो दिन जब तूने प्रोफेसर से बहस कर ली थी?”

रवि हँस पड़ा। “और तूने मुझे खींचकर बाहर लाकर कहा था, ‘जाने भी दो यारों, सप्लीमेंट्री दे देंगे।’”

दोनों हँसने लगे। कुछ पल के लिए सब हल्का हो गया।

फिर वही चुप्पी।

“शायद,” अमित ने धीरे से कहा, “हम ‘जाने भी दो’ का मतलब गलत समझते रहे। ये हार मानना नहीं होता… ये बस खुद को थोड़ा सुकून देना होता है।”

रवि ने चाय का आखिरी घूंट लिया। “और अगर सुकून ही ना मिले?”

अमित ने कंधे उचकाए। “तो फिर… ढूँढना पड़ेगा। कहीं और, किसी और में… या शायद खुद में।”

बारिश अब थमने लगी थी। सड़क साफ दिखने लगी थी, लेकिन दिल के अंदर की धुंध अभी बाकी थी।

रवि ने जेब से फोन निकाला। स्क्रीन पर एक नाम फ्लैश हो रहा था, जिसे वो कई दिनों से अनदेखा कर रहा था।

उसने कुछ पल सोचा… उँगलियाँ स्क्रीन पर ठहरी रहीं।

अमित ने कुछ नहीं कहा।

और फिर…

रवि ने फोन वापस जेब में रख लिया।

“चल,” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “आज के लिए… जाने भी दो यारों।”

दोनों सड़क पर चल पड़े। पीछे छूट गई चाय की दुकान, वो बातचीत, और शायद कुछ अधूरे सवाल भी।

लेकिन क्या सच में सब ‘जाने दिया’ गया था…
या बस थोड़ी देर के लिए टाल दिया गया था…

ये कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।


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