गुजिया - रिश्तों की मिठास

MeenalSonal
Wed 04, 2026

रिश्तों में समय रहते बातें पूरी करना, अपने मन की बात कहना और भावनाओं को सहेजना ज़रूरी होता है। कुछ चीज़ें सुधारी जा सकती हैं, लेकिन हर बार नहीं। इसलिए जो आज है, उसे संभालना ही सबसे बड़ी समझदारी है।

होली की सुबह थी। खिली-खिली धूप आँगन में फैल रही थी, और उसके साथ ही सर्द हवाएँ धीरे-धीरे विदा ले रही थीं। रसोई से घी और मावे की मीठी खुशबू उठकर पूरे घर में घुल रही थी, वही खुशबू, जिसका हर साल घर पर सभी इंतजार करते हैं।

दादी रसोई घर में बैठी थीं, हाथों में आटा और आँखों में सालों का सलीका लिए। उनके पास बैठी थी नन्ही आर्या, जो हर बार की तरह इस बार भी गुजिया बनाने का राज़ जानने आई थी।

“दादी, ये गुजिया हर बार एक जैसी क्यों नहीं बनती?” आर्या ने आटे को अपनी उँगलियों से छेड़ते हुए पूछा।

दादी मुस्कुराईं, “क्योंकि हर बार मन एक जैसा नहीं होता, बिटिया।” आर्या ने हैरानी से देखा, जैसे बात समझने की कोशिश कर रही हो, लेकिन बात उसके सिर के ऊपर से निकल गई।

दादी ने एक गुजिया को मोड़ते हुए कहा, “देख, ये जो किनारे हैं ना, इन्हें बंद करना सबसे मुश्किल होता है। अगर ध्यान न रहे तो अंदर की मिठास बाहर आ जाती है…और फिर गुजिया अधूरी रह जाती है।”

आर्या ने तुरंत एक गुजिया उठाई और उसे ज़ोर से दबाकर बंद करने लगी। किनारे टेढ़े-मेढ़े हो गए, लेकिन वह खुश थी।

“ऐसे?” उसने चमकती आँखों से पूछा।

“नहीं… ऐसे नहीं, इसे धीरे-धीरे, प्यार से बंद करना होता है। ज़बरदस्ती से कुछ भी पूरा नहीं होता।”

थोड़ी देर चुप्पी रही। बाहर गली में बच्चे रंग खेल रहे थे, हँसी की आवाज़ें हवा में तैर रही थीं।

अचानक दादी का ध्यान अलमारी के कोने में रखी एक पुरानी थाली पर गया, उन्होंने उसे उठाया और धीरे से सहलाया। “ये थाली तुम्हारी परदादी की है,” उन्होंने धीमे से कहा, “उसी में पहली बार मैंने गुजिया बनाई थी… और उसी दिन मैंने एक गलती भी की थी।”

आर्या की जिज्ञासा फिर जाग गई। “कैसी गलती?”

दादी ने खिड़की के बाहर देखा, जैसे कोई पुरानी तस्वीर सामने आ गई हो।

“उस दिन… मैंने भी एक गुजिया के किनारे ठीक से बंद नहीं किए थे। पर बात सिर्फ गुजिया की नहीं थी। किसी अपने के साथ भी मैंने वैसा ही किया… बात अधूरी छोड़ दी, दिल खोलकर नहीं कहा जो कहना चाहिए था।”

आर्या चुप हो गई। “फिर?” उसने धीरे से पूछा।

दादी ने हल्की सी साँस ली। “फिर… वो इंसान चला गया। और मैं हर साल गुजिया बनाते हुए सोचती रही, अगर उस दिन मैंने किनारे ठीक से बंद किए होते, तो शायद मिठास बाहर न आती… और कुछ बातें अधूरी न रह जातीं।”

रसोई में फिर से सन्नाटा पसर गया। सिर्फ कढ़ाई में तलती गुजियों की हल्की-सी आवाज़ थी।

कुछ देर बाद दादी ने कढ़ाई में तैरती गुजिया को देखते हुए कहा—

“अब तो सब कुछ जल्दी हो गया है… है ना।”

आर्या ने उनकी तरफ देखा, “जल्दी?”

“हूँ…” दादी हल्के से मुस्कुराईं, “पहले लोग बातों को पकने देते थे… जैसे ये गुजिया। धीरे-धीरे… अंदर तक।”

बाहर रंगों का शोर बढ़ता जा रहा था।

आर्या ने चुपचाप एक गुजिया उठाई। इस बार उसने उसे बहुत ध्यान से मोड़ा, किनारों को एक-एक कर के दबाया, बिना ज़ोर लगाए, जैसे कोई राज़ संभाल रही हो।

“दादी…” उसने धीमे से पूछा, “अगर कोई गुजिया खुल जाए, तो क्या उसे फिर से बंद किया जा सकता है?”

दादी ने उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी, आशा और अफ़सोस के बीच कहीं।

“कभी-कभी…” उन्होंने कहा, “पर हर बार नहीं।”

आर्या ने कुछ नहीं कहा। उसने गुजिया को कढ़ाई में डाल दिया और उसे ध्यान से तैरते हुए देखने लगी।

अंदर… कुछ बातें अब भी धीरे-धीरे पक रही थीं।

कढ़ाई में एक गुजिया हल्के से खुल गई। उसका मावा तेल में घुलने लगा, मिठास फैल गई, उसका आकार बिगड़ गया।

आर्या ने उसे देखा, फिर धीरे से अपनी उँगलियों से दूसरी गुजिया के किनारों को थोड़ा और ठीक किया।

दादी कुछ नहीं बोलीं।

बाहर रंगों का शोर था,
अंदर… दो पीढ़ियाँ बैठी थीं, एक, जो कुछ खो चुकी थी… और एक, जो शायद समझ रही थी कि क्या खोने नहीं देना चाहिए।

और शायद… कुछ बातें बिना बोले ही पूरी हो जाती हैं।

या शायद… कुछ गुजियाएँ हमेशा अधूरी ही रह जाती हैं।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

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2 comments on “गुजिया - रिश्तों की मिठास”

  1. Beautifully written Meenal! You have shared some beautiful life lessons with this story. Gujiya ki tarah rishton ko bhi pyaar se sambhalkar rakhna padta hai.

    Loved this!

    Cheers,
    CRD
    Do drop by mine.

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