उम्मीदें कावेरी अम्मा की

MeenalSonal
Fri 04, 2026

आज भी रोज़ की तरह कावेरी अम्मा भोर में उठीं। आसमान हल्का नीला हो रहा था और दूर पहाड़ियों के पीछे से सूरज झाँकने की कोशिश कर रहा था। आश्रम एक छोटे-से गाँव के किनारे बना था जिसके चारों तरफ नीम और पीपल के पेड़, बीच में कच्चा आँगन, और किनारे पर मिट्टी-ईंटों से बना पुराना बरामदा। बरसों पुरानी दीवारों पर समय की लकीरें साफ दिखाई देती थीं।

अम्मा ने चूल्हा जलाया, बच्चों के लिए नाश्ता बनाया और फिर अपना हाथ पंखा लिए बरामदे में आकर बैठ गईं पर आँखों में वही रोज़ का इंतज़ार बसा था।

धीरे-धीरे बच्चे उठने लगे। कोई किताबें समेटता, कोई बाल संवारता, कोई जल्दी-जल्दी खाना खाकर निकलने को तैयार। एक-एक करके सब अपने काम पर जाने लगे कोई स्कूल, कोई कॉलेज, कोई नौकरी पर, तो कोई नौकरी की तलाश में।

जाते-जाते हर कोई कावेरी अम्मा से कुछ न कुछ कह जाता,
“अम्मा, आज खिचड़ी बनाना”
“अम्मा, मेरी कंघी टूट गई”
“अम्मा, दरवाज़ा फिर चरमराने लगा”

कावेरी अम्मा सबकी बातें सुनतीं, मुस्कुरातीं, और मन ही मन सोचतीं, “कभी मुझसे भी तो कोई पूछे कि मुझे क्या चाहिए”

कावेरी अम्मा की अपनी कोई संतान नहीं थी। पति का साया भी जल्दी उठ गया था। उन्होंने उनके अधूरे सेवा-कार्य को अपनाया और धीरे-धीरे इन अनाथ बच्चों की ही माँ बन गईं। उनकी दुनिया यही घर था और यही बच्चे।

इन सबमें सबसे अलग था मोहन। शांत, समझदार और जिम्मेदार। वह बिना कहे ही अम्मा के मन की बात समझ जाता था।

एक दिन, जब सब बच्चे निकल गए, मोहन वहीं रुक गया।

कावेरी अम्मा ने पूछा, “अरे मोहन, आज तू गया नहीं काम पर?”

मोहन हल्के से मुस्कुराया, “अम्मा, आज मेरा काम यहीं है।”

अम्मा कुछ समझ पातीं, उससे पहले ही मोहन ने बाहर आवाज़ लगाई। थोड़ी ही देर में बाकी बच्चे भी लौट आए। किसी के हाथ में पुराना कपड़ा था, कोई कुछ जोड़-घटाकर कुछ बना रहा था, और कोई बड़े जतन से कुछ छुपाए खड़ा था।

कावेरी अम्मा हैरान होकर सब देख रही थीं।

तभी मोहन आगे बढ़ा। उसने एक कपड़े में लिपटी चीज़ धीरे से उनके सामने रखी और कहा, “अम्मा… इसे खोलिए।”

कावेरी अम्मा ने कांपते हाथों से कपड़ा हटाया। सामने एक पुराना लेकिन साफ-सुथरा रेडियो रखा था।

उनकी आँखें जैसे ठहर गईं।

“ये…?” उन्होंने धीमे से पूछा।

मोहन बोला, “अम्मा, आपने कभी नहीं बताया पर हम जानते हैं कि आपको गाने सुनना कितना पसंद है। पड़ोस में जब भी रेडियो बजता था, आप काम करते-करते रुक जाती थीं”

एक बच्ची बोली, “और उस दिन आपने कहा था, ‘हमारे ज़माने में मैं भी गाया करती थी’”

दूसरा लड़का हँसते हुए बोला,“तो हमने सोचा, अम्मा को उनका साथी वापस दे देते हैं।”

कावेरी अम्मा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने रेडियो को ऐसे छुआ जैसे कोई पुराना अपना मिल गया हो।

मोहन ने धीरे से उसे चालू किया। कुछ खड़खड़ाहट के बाद मधुर संगीत की धुन हवा में घुल गई।

बरामदा जैसे बदल गया।

कावेरी अम्मा की आँखें बंद हो गईं। उनके होंठों पर हल्की मुस्कान आई। शायद वो अपने पुराने दिनों में लौट गई थीं जब वो सिर्फ किसी की देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि खुद एक कलाकार थीं और संगीत जिनकी पहचान था।

उन्होंने बच्चों को पास बुलाया और बोलीं, “मुझे कुछ नहीं चाहिए था बस ये आवाज़ ये साथ यही मेरा अपना था”

मोहन ने उनका हाथ थाम लिया, “अब ये हमेशा आपके साथ रहेगा, अम्मा।”

उस दिन बरामदे में सिर्फ पंखे की हवा नहीं, संगीत भी बह रहा था और कावेरी अम्मा के चेहरे पर जो सुकून था, वो बरसों बाद लौटा था।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

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