हमारी प्रकृति अद्भुत है, अनोखी है अनमोल है जो हमें मोहित कर देती है | प्रकृति के बीच मन शांत और ताज़ा महसूस करता है। चिड़ियों के कलरव, कल कल करती नदियां, हवाओं की साएं साएं , फूलों पर भिनभिनाता भौंरा, या तालाब में किनारे टर्र-टर्र करते मेंढक, प्रकृति की हर रचना अपनी एक अद्वितीय ध्वनि से जुड़ी है।
अगर हम शांत मन से सुनें तो प्रकृति से उत्पन्न ध्वनियां हमारे मन को मुग्ध कर देती हैं। किंतु क्या आप जानते हैं यह ध्वनियां आई कहां से, इसका स्त्रोत क्या है?
हमारे पुराणों के अनुरूप प्रकृति के रचयिता ब्रह्मा जी हैं। उन्होंने पृथ्वी के जीव जंतुओं को भिन्न भिन्न आकारों में ढाला और संवरा। ऐसा माना जाता है की ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना को देख कर खुश नहीं थे। उन्हें अपनी बनाई हुई श्रृष्टि बहुत सूनी लग रही थी। उन्होंने विष्णु जी से अपनी बात कही तब विष्णु जी ने उन्हें मां सरस्वती की सहायता लेने को कहा।
ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी का आहवान किया और अपनी सहायता करने को कहा। तब माता सरस्वती ने अपनी वीणा से विभिन्न ध्वनियां उत्पन्न की जिससे श्रृष्टि में मधुर ध्वनियों का प्रवाह हुआ। इसी कारण सरस्वती मां को (वाणी की देवी) वाग्देवी भी कहा जाता है। माता सरस्वती सिखलाती हैं कि हमें अपनी वाणी को हमेशा मधुर रखनी चाहिए।
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वसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। मां सरस्वती वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थी, इसी कारण इस दिन को मां के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मां सरस्वती वाणी, विद्या, ज्ञान-विज्ञान एवं कला-कौशल आदि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। वे मनुष्य को ज्ञान तथा कला के प्रकाश की ओर ले जाती हैं।
“सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम् ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना: ॥”
– सरस्वती वंदना श्लोकअर्थ- वाणी की देवी माता सरस्वती जी को नमस्कार, जिनके आशीर्वाद मात्र से मानव देव समान हो जाता है।
अक्सर देखा गया है कि लोग बसंत और वसंत पंचमी में से क्या सही है इसको समझाना चाहते है , तो देखते है की इन शब्दों में कोई अंतर है या नहीं। बसंत और वसंत दोनों ही सही है, वसंत संस्कृत शब्द है और वही बसंत हिंदी जिसका अर्थ है वसंत ऋतु।
पीले रंग को हिंदू धर्म में एक शुभ रंग माना जाता है और वसंत पंचमी या सरस्वती पूजा के दौरान इसका विशेष महत्व है। पीला रंग देवी सरस्वती से जुड़ा हुआ है क्योंकि यह उनका पसंदीदा रंग है। पीला रंग ज्ञान, समझ और बुद्धिमत्ता का रंग है, जो सभी देवी से जुड़े हुए हैं।
आइए वसंत पंचमी के दिन हम सभी माता सरस्वती से यह आशीर्वाद मांगे की हम सब पर सदा ऐसे ही ज्ञान, वाणी और कला का आर्शीवाद बनाएं रखें और इस कौशल का सही रूप में उपयोग करने की शक्ति प्रदान करें।
आज साहित्य, कला और संस्कृति का हमारे जीवन में बड़ा ही महत्व है जो मानव जीवन को एक सकारात्मक दिशा की ओर केंद्रित करते हैं। यह हमारा पहला लेख है। हमारा प्रयास रहेगा हम साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़ी रोचक बातें आपके लिए लेकर आएं।
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सरल व्यक्तित्व, सादा जीवन, कठिन परिश्रमी और शान्ति के दूत; जी हां यह कोई और नहीं बल्कि हमारे अपने गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री जी हैं जिनकी विचारधारा आज तक सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है।
सरल जीवन, उच्च विचार,
कांपे अंग्रेज सुन शान्ति की ललकार।
देश के आगे और कुछ न सूझा,
लहराया विजयी पताका ऊंचा।
एकता और अखंडता का पाठ सिखाया,
न उठाई लाठी न कोई टकराया,
उनके धैर्य के आगे न कोई टिक पाया,
इतनी गौरवशील थी जिनकी काया।
आईए जानें महात्मा गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन की ऐसी कई विशेषताएं जिनका यदि पूरी निष्ठा से पालन किया जाए तो व्यक्ति जीवन में सुखी रह सकता है।
लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता, विनम्रता, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति के लिए माने जाते हैं। देश के प्रधान मंत्री के रूप में उनकी दूरदर्शिता ने देश को प्रगति का मार्ग दिखलाया।
अनुशासन एक बहुमूल्य गुण है जो जीवन में कुशलता और आत्मविश्वास से आगे बढ़ने की क्षमता का सार्थक है। एक अनुशासित नागरिक अपने देश के कुशल भविष्य की अहम पूंजी है। ऐसी ताकत को परास्त करना नामुमकिन है।
पाठ १: अनुशासन की आदत जीवन को संवार देती है।
शास्त्री जी की सादगी और दृढ़ता का पाठ सबके लिए आज तक प्रेरणा का स्त्रोत है। देश के नागरिकों को एक दिशा दिखाने के लिए वे सर्वप्रथम खुद किसी कार्य को करने में सदा तत्पर रहते थे। देश के प्रधानमंत्री होने के नाते उन्होंने लोगों को सिखाने के लिए अपने आपको हर कार्य में आगे रखा।
पाठ २: किसी को अगर कोई बात सिखानी हो तो उस पर पहले खुद को अमल करना चाहिए।
शास्त्री जी का सर्वप्रथम उद्देश्य देश में शान्ति और खुशहाली का पाठ लोगों को सिखलाना था। शांत मन हर कठिन परिस्थिति से निकलने में सक्षम होता है। जब मन शांत होगा तभी एकाग्रता से कार्य कर पाएगा।
पाठ ३: हमें हर पल आंतरिक और बाहरी शान्ति को पाने की कोशिश करनी चाहिए।
सब साथ चलेंगे, सब साथ परिश्रम करेंगे तो पथरीले रास्ते भी आसानी से पर हो जाते हैं। एकता में जो शक्ति है वह और कहीं नहीं है, और यही कारण था की हमारा देश आजाद हो पाया।
पाठ ४: हर कार्य अकेले करना संभव नहीं होता। एकता की शक्ति सर्वोपरि है।
भारत में राष्ट्रपिता के नाम से लोकप्रिय महात्मा गांधी ने दुनिया भर के अरबों लोगों को उनके सिद्धांतों पर जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है।
हम सभी ने देखा है कि गांधीजी की मानसिक शक्ति इतनी मजबूत थी कि जब दूसरे देशों में गांधीजी के बारे में सुनने वाले लोग अक्सर उनकी शारीरिक बनावट को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। बापू एक आदर्श उदाहरण हैं जो बताते हैं कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो भौतिक क्षमता की परवाह किए बिना पहाड़ों को भी हिलाया जा सकता है।
पाठ 1: जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए अपनी मानसिक शक्ति मजबूत रखें।
अगर प्रयास पूरे मन से किया जाय तो जीत निश्चित है। हां, गांधीजी के जीवन ने हमें सिखाया कि प्रयासों में संतुष्टि ही जीवन की कुंजी है। हालाँकि हमारे देशवासियों ने आज़ादी के लिए वर्षों तक संघर्ष किया, लेकिन निरंतर प्रयासों से ही यह संभव हो सका। यदि आप विजयी परिणाम चाहते हैं तो अपना 100% देते रहें।
पाठ 2: अंत में विजयी परिणाम के लिए अपने प्रयासों में संतुष्टि रखें।
गांधीजी एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी कुछ जरूरतें नहीं थीं और वह अपने हमेशा चमकते मुस्कुराते चेहरे के साथ एक खुशहाल जीवन जीते थे। कठिनतम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी आवश्यकताओं को सरल रखा। इससे उनका ध्यान देश के अन्य ठोस मुद्दों पर केंद्रित रहता था।
पाठ 3: जीवित रहने के लिए पर्याप्त होना खुशी की कुंजी है।
गांधी जी स्वाभिमान के साथ अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं।
स्वाभिमान, स्वयं से प्रेम करना है। जब हम खुद का सम्मान करते हैं और अपने कार्यों को महत्व देते हैं तभी कोई व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ कई चीजें हासिल कर सकता है। एक विनम्र व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति को जानने के लिए किसी झूठी प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए स्वयं को पहले रखें और देखें कि परिस्थितियाँ कैसे बदलती हैं।
पाठ 4: आत्मसम्मान जीवन जीने की कुंजी है।
सुखी जीवन जीने के लिए गांधीजी और शास्त्री जी के सिद्धांत उल्लेखनीय हैं और इन्हें जीवन में अपनाना चाहिए। यह अमूल्य बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आशा, स्वतंत्रता, भक्ति, सच्चाई और आत्म-सम्मान पैदा करती हैं। आइए हम सभी खुशहाल जीवन जीने के लिए उनके कुछ सिद्धांतों का पालन करने का प्रयास करें और स्वयं से वादा करें की हम यह सीख अपने आने वाली पीढ़ी को अपना कर उनके लिए एक उदहारण बनें।
तुम इतना जो मुस्कुरा रही हो,
क्या गम है जिसको छुपा रही हो…….
आप सोच रहे होंगे मैं यह गाना क्यों गुनगुना रही हूँ। हमारे गीतों में और बोली में हम न जाने कितने भाव व्यक्त करते हैं।
हमारी सार्वजनिक दुनिया या वर्चुअल वर्ल्ड में विभिन्न भावों को दर्शाते पीले गोल मटोल चेहरे नहीं होते तो क्या होता। आपने सही समझा, मैं यहाँ इमोजी की बात कर रही हूँ।
हम सब जानते हैं कि अपने आपको अभिव्यक्त करना सार्वजनिक दुनिया में कितना जरूरी हो गया है। हम क्या सोच रहे हैं, कौनसी बात हम कैसे रखना चाहते हैं और कैसे सही मायने में बात हमारे अपनों तक पहुँच पाए यह बहुत आवश्यक है।
जब हम आमने सामने नहीं होते हैं तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि दूसरों के भाव हमारे भाव से मेल खा रहे हैं या नहीं। जैसे उदाहरण के तौर पर एक सोशल ग्रुप के कई सदस्य कुछ बातों को हँसी मज़ाक में लेते हैं, तो किसी किसी को वही बात बुरी लग जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि आप किस भाव में वह मैसेज पढ़ रहे हैं। यहाँ आपका काम आसान करने के लिए इमोजी का आविष्कार हुआ।
अपने मैसेज में इमोजी को शामिल करने से कम से कम हम दूसरों को यह बता रहे हैं कि मैसेज को किस भाव या एक्सप्रेशन से पढ़ना है। तो है न एक छोटा सा इमोजी बहुत काम की चीज!
आजकल के युवा इस वर्चुअल एक्सप्रेशन से ही घिरे रहते हैं। पर ध्यान रहे की आपकी इमोजी का एक्सप्रेशन आपके एक्सप्रेशन से मेल खा रहा हो। कई बार वर्चुअल चैट में ऐसा भी होता है कि हमारे इमोजी हमारे भाव से मेल नहीं खाते। ना चाहते हुए भी कई बार हम बस कुछ रिएक्ट करने की होड़ में खुद से ही दूर हो जाते हैं।
तो फिर यह गीत तो बनता है,
तुम इतना क्यों मुस्कुरा रही हो
क्या गम है जिसको छुपा रही हो……
आप कहेंगे ऐसा तो कई बार रियल वर्ल्ड में भी हो जाता है। बिल्कुल होता है, लेकिन आप ज्यादा देर तक ढ़ोंग नहीं कर सकते और दूसरे भी आपकी दिल की बात को समझ जाते हैं क्यूंकि वे आपके असली भाव को भाँप लेते हैं। लेकिन वर्चुअल वर्ल्ड में जहाँ हम एक दूसरे को देख नहीं सकते वहां यह तय करना बहुत कठिन हो जाता है।
अगर हम एक क्षण के लिए भी सोचें की अगर चेहरे पर भाव ही नहीं दिखते तो क्या होता। में तो कहूंगी की हम सब फिर एक रोबोट की तरह लगते।
हमारे भाव बहुत कुछ कह जाते हैं। एक वक्ता अपने भाषण को जीवंत बनाने के लिए स्वरों की विविधता तथा चेहरे के भाव का उपयोग करता है। तभी तो श्रोताओं को उनको सुनने में रुचि होती है।
एक छोटी सी मुस्कुराहट कभी-कभी पूरे दिन की ऊर्जा बन जाती है। कितने विचित्र हैं यह भाव जो न जाने कितने राज़ छुपा जाते हैं और बहुत कुछ बिना कहे बता भी देते हैं। सच तो यह है कि हमारे मन के आईने हमारे भाव हैं और फिर चाहे असली दुनिया हो या वर्चुअल वर्ल्ड हमें जुड़ने और एक दुसरे को समझने के लिए भाव या इमोजी ही काम आते हैं।
इमोजी का रंग पीला क्यों होता है?
हम सब जानते हैं इमोजी की बात आते ही पीले गोल मटोल चेहरे पर तरह तरह के भाव हमारे सामने आ जाते हैं।
पर क्या आप जानना चाहेंगे पीले रंग का राज़?
पीला रंग प्रतीक होता है खुशी का, उल्लास का और इसीलिए यह रंग हमारी आंखों को आकर्षित करता है। पीला रंग विभ्योर के पिरामिड में पाँचवे स्थान पर आता है जिसकी वजह से यह रंग बहुत दूर से भी दिखाई देता है।
यह भी माना जाता है कि पीला रंग हमारे त्वचा से भी बहुत मेल खाता है इसीलिए इमोजी का रंग पीला चुना गया है।
सबसे पहली इमोजी कौनसी सी थी?
सबसे पहली इमोजी मुस्कुराने वाले भाव की थी। स्माइली चेहरे के डिज़ाइन में वास्तविक मुस्कान एक सकारात्मक व्यवहार को प्रभावित करने का काम करती है।
कहाँ और कब जन्म हुआ इमोजी का?
इमोजी का यह प्रसन्न चेहरा असल में एक बीमा उधोग की देन है। अक्सर लोग बीमा करवाने कई विपरीत परिस्थितियों में ही जाते हैं तो यह कंपनी अपने ग्राहकों को खुशी के दो पल देने के लिए इस आकर्षित करने वाले पीले प्रसन्न चेहरे को अपनी कंपनी का हिस्सा बनाया। तो इस तरह पीले स्माइली चेहरे का जन्म 1963 में वॉर्सेस्टर, मैसाचुसेट्स में हुआ।
वहाँ से इस स्माइली चेहरे ने बहुत सफर तय किए और और आज यह हमारे फोन में हमारे करीब हैं।
तो मुस्कुराते रहिए इस स्माइली इमोजी की तरह और देखिए जिंदगी कितनी आसान और खुश हाल हो जाएगी।
बदलाव जीवन का स्त्रोत है, और अच्छा बदलाव जीवन की परिभाषा ही बदल देता है।
लेकिन हमने अक्सर देखा है कि हम किसी भी प्रकार के बड़े छोटे बदलाव को अपनाने से डरते हैं। हम हमेशा हिचकते हैं कुछ नया अपने जीवन में शामिल करने से, या फिर किसी चीज़ का अपने जीवन से त्याग करने से।
फिर चाहे वह एक तुच्छ बदलाव ही हो। शायद ऐसा इसीलिए है क्योंकि हमें लगता है कि क्या नया स्वरूप अच्छा होगा? इसके परिणाम कैसे होंगे? फिर हमारी नकारात्मक ऊर्जा बहुत तीव्र हो जाती है और फिर हम उसी समय सारणी के साथ चलते रहते हैं।
बदलाव बड़े स्तर पर हो या बहुत छोटा, हर नई चीज़ अपने साथ नई चुनौतियाँ लाती है। किन्तु यह सब कुछ पलों के लिए या फिर कुछ दिनों के लिए ही होता है, लेकिन उनके सकारात्मक प्रभाव हमें बाद में ही पता चलते हैं।
हम सबको यही सोचकर चलना चाहिए कि जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए ही होता है। इसी सोच को अपना मित्र बनाकर कार्य करते रहने चाहिए। हर नए पल को दोनों हाथों से बटोर कर उसका भरपूर आनंद लेना चाहिए।
तो चलिए जानें वो पाँच आदतें जो आपके जीवन में बदलाव ला सकती हैं:
१. अपने लक्ष्य को लिखें
२. अपना पसंदीदा काम करें
३. अच्छी सोच रखें
४. ना बोलना सीखें
५. अपने आप पर विश्वास रखें
छोटे लक्ष्य बनाएँ, जिन्हें तय करना सरल हो। जैसे अपने काम को तय समय में ख़त्म करना या फिर जो कार्य आप बहुत समय से करना चाहते हैं उसे पूर्ण करना।
जब हमारे कार्य लिखित में हमारे सामने होते हैं तो वे हमें एक चुनौती जैसे दिखाए देते हैं। कार्य पूर्ण होने पर जब हम उस कार्य पर टिक लगाते हैं तो बहुत उत्साहित महसूस करते हैं। साथ ही आप अपने लिस्ट के अगले लक्ष्य की ओर तुरंत केंद्रित हो जाते हो।
अक्सर ऐसा होता है की हम उन कार्यों में उलझ कर रह जाते हैं जो हमें कम पसंद होते हैं और हमारे रुचि के कार्यों के लिए समय ही नहीं निकाल पाते। लेकिन अगर कुछ ठान लें तो फिर कुछ भी नामुमकिन नहीं होता। जब आप अपने लक्ष्यों को लिखें तो उसमें अपने पसंदीदा काम को ज़रूर शामिल करें। फिर देखें कैसे इस बदलाव से आपमें नई ऊर्जा आ जाती है।
आप कैसे हैं, यह आपकी सोच पर निर्भर करता है। यह बिल्कुल सत्य है; आपकी सोच आपके व्यक्तित्व को संवारती है। सकारात्मक सोच रखने वाले लोग कभी नए बदलाव से घबराते नहीं है, बल्कि उन चुनौतियों का डट कर सामना करते हैं। सकारात्मक विचार जीवन की नींव होते हैं, और हमें अपनी नींव को हिलने नहीं देना है।
जब हम बदलाव की बात कर रहें हैं तो बदलाव हमेशा कार्यों को कौशलता से करना या नए कार्यों को शामिल करना मात्र ही नहीं होता है। किन्तु कुछ कार्यों को त्यागना या फिर मना कर देना भी बदलाव का हिस्सा है।
किसी भी चीज़ के लिए कभी कभी ना कहना कठिन हो जाता है। लेकिन प्राथमिकता कार्यों को पूर्ण करने की ही नहीं बल्कि उन्हें अपनी गति से और अपने पसंदीदा काम को शामिल करना होना चाहिए। कभी कभी हम खुद को इतना व्यस्त कर लेते हैं कि हम इतने सारे कार्यों को संभाल ही नहीं पाते। अपने कार्यभार को केंद्रित रखें और साथ ही साथ अपने पसंदीदा कार्य के लिए समय ज़रूर दें।
कहते हैं कि सोच लेने से दुनिया बदल जाती है परन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आपको अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होकर काम भी करना पड़ता है और वो भी अपने आप पर अटल विश्वास के साथ। मान लीजिए की यह एक महत्वपूर्ण पूँजी है बदलाव की।
Importance of change in Life
बदलाव का पालन करना कठिन हो सकता है पर नामुमकिन नहीं। परिवर्तन का स्वागत करें, कभी-कभी कुछ नया करने की कोशिश एक उज्ज्वल परिप्रेक्ष्य का स्वागत कर सकती है। एक फलते-फूलते बदलाव का स्वागत करने के लिए समय रहते डर और दिनचर्या पर काबू पाना होगा क्योंकि यह आपके रास्ते को और अधिक सुंदर और बेहतर बना सकता है।
जीवन में हमेशा तीखे मोड़ वाले रास्ते होते हैं, लेकिन हमारे वाहन में बदलाव जिसे मन कहा जाता है, हर मोड़ को आसान बना सकता है। इस प्रकार, परिवर्तन और कुछ नहीं बल्कि एक बेहतर व्यक्ति के रूप में कायापलट करने के लिए अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्गठित करना, परिष्कृत करना, नए सिरे से ढ़ालना है। असफलताओं को एक अलग दृष्टिकोण से देखें, आपको निश्चित रूप से एक नई शुरुआत मिलेगी जो केवल आपकी प्रतीक्षा कर रही है।
नारी को हमेशा त्याग और समर्पण की मूरत माना गया है। और यह सच भी है, घर में एक माँ का रूप ही हमें यह बात समझा देता है। हमारी प्रकृति भी हमें प्रति दिन ऐसे कितने ही उदाहरण से संवारती है, एक नन्ही सी चिड़िया पहले अपनों को खिलाती है फिर वह अपने बारे में सोचती है। नारी के इस सुंदर निस्वार्थ स्वरूप का महत्व सबसे अनमोल है।
हर घर के बुनियाद कि आधे हिस्सेदारी रखने वाली नारी को भी समय समय पर अपने लिए कुछ पहलुओं पर ध्याद देना अति आवश्यक है। जैसे प्रकृति समय समय पर अपने आप को संवारती है, सजाती है, और दृढ़ बनाती है ठीक वैसे ही हर नारी को सशक्त बनाते हैं कुछ पहलू।
साल दर साल हम नए संकल्प लेते हैं और उन्हें पूर्ण करने की पूरी कोशिश करते हैं।
तो आइए देखें आख़िर क्या हैं वो आदतें जो नारी को संकल्प के रूप में अपनाने चाहिए और कैसे यह संकल्प सकारात्मक प्रभाव डालने में कारक हैं।
घर की महिला परिवार की रीढ़ होती है और ज्यादातर अन्य चीजों को प्राथमिकता देकर अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करती है। लेकिन हमें यह समझने की जरूरत है कि नियमित स्वास्थ्य जांच हमें किसी भी तरह की कमी या बीमारी के शुरुआती चरणों में बेहतर ढंग से सामना करने में मदद कर सकती है। परिवार अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन स्वयं का स्वास्थ्य सबसे पहले है और इस पर समय-समय पर ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसा कि कहा जाता है "पहले अपने आप से और फिर दुनिया से प्यार करें", इसलिए व्यायाम में नियमित रहें और स्वास्थ्य और फिटनेस को नियमित रखें बाकी सभी चीजें इंतजार कर सकती हैं।
दूसरा संकल्प स्किल्स को अपग्रेड करना है, चाहे वह पेशेवर हो या व्यक्तिगत, नई चीजें सीखते रहने की जरूरत है। सीखना हमेशा मददगार होता है और हमें सकारात्मक ऊर्जा देता है। एक महिला के पास हमेशा बहुत सारे कार्य होते हैं किंतु एक नियमित पाठ्यक्रम में भाग लेना शायद बोझिल हो सकता है। इस ऑनलाइन दुनिया में कौरसेरा और एनपीटीईएल जैसी कई वेबसाइटें हैं जो विषयों की विस्तृत श्रृंखला पर विभिन्न प्रमाणपत्र प्रदान करती हैं। अपने कौशल का उन्नयन करें और नए उपक्रमों की तलाश करें जो आपको संतुष्टि और खुशी प्रदान करें। आप घर बैठे ही अपने समय अनुसार अपने आप को अपडेटेड रख सकती हैं।
हम सभी ने देखा है कि अगर नींव से और जड़ स्तर पर किया जाए तो परिवर्तन प्रभावशाली होता है। इसलिए अगर हम भविष्य की बेहतरी की तलाश कर रहे हैं तो उसमें भी महिला की अहम भूमिका होती है। अगर महिलाएं एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करने का फैसला करती हैं और खरीदारी के लिए कपड़े के थैले ले जाने के रूप में एक छोटा सा बदलाव करती हैं, तो यह छोटा सा बदलाव निश्चित रूप से पर्यावरण को हरा-भरा बना सकता है। अगर हम चाहते हैं कि बदलाव सफलतापूर्वक शुरू हो तो महिला की अहम भूमिका है। इस २०२३ को हरित बनाएं और हमारे बच्चों और नाती-पोतों के लिए स्वच्छ पर्यावरण के लिए नई सोच प्रदान करें।
हाँ, यह अंतिम संकल्प है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भी है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में हो रही घटनाओं की श्रृंखला को ध्यान में रखते हुए महिलाओं को अपनी सुरक्षा का जिम्मा खुद लेने की जरूरत है। महिला हर समय पहुंचने के लिए मदद पर निर्भर नहीं रह सकती। इसलिए, रक्षा कक्षाओं में दाखिला लेने से महिला को किसी भी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए और अधिक आत्मविश्वास मिल सकता है। ऐसा करने से आपमें एक नई ऊर्जा और आत्म विश्वास जागेगा।
आज महिलाएँ चाहे कहीं भी पहुँच जाएँ लेकिन उनके बिना एक घर अधूरा है। अगर आप हंसती है तो घर हंसता है, और आपकी परेशानी सारे घर के सदस्यों को उदास कर देती है। इसीलिए महिलाओं को अपनों का ही नहीं बल्कि अपने अंदर के कौशल को तराशने की भी जिम्मेदारी है। आखिर ! हम महिलाएँ ही तो एक नई सोच और विचारधारा की जननी हैं।
यह तो सब जानते हैं कि नारी जो एक बार ठान ले तो फिर क्या कुछ नहीं कर सकती, देखें कैसे।