आज आज़ादी के उत्सव पर मन प्रश्नों में डूबा था। जहां एक ओर हम डिजिटल इंडिया और आर्थिक स्थिरता की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और अपमानजनक व्यवहार उनके जीवन को संकट में डाल रहे हैं। देश की प्रगति में नारी का भी उतना ही हाथ है जितना पुरुष का। नारी का सम्मान और समानता उनका अधिकार है। देश में एक बदलाव की जरूरत है, हमारी मानसिकता और दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव की।

हम सभी को ऐसे बदलाव की आशा करनी चाहिए जो एक व्यक्ति को वास्तविक मानव बनाए। हम सभी को न केवल ऐसे अमानवीय कृत्य होने पर बदलाव के लिए दहाड़ने की जरूरत है, बल्कि बदलाव की दिशा में लगातार काम करने की भी जरूरत है। जब ऐसे अमानवीय कृत्य होते हैं तो हम सभी को सकारात्मक बदलाव के लिए कार्रवाई करने के लिए अनुस्मारक की आवश्यकता क्यों होती है, और फिर जब तक ऐसे कृत्य दोबारा नहीं होते तब तक पूरी तरह से चुप्पी साध ली जाती है।

यह नीचे दी गई हिंदी कविता हमें अशोभनीय कृत्यों के बाद चुप्पी होने पर भी न्याय के लिए दहाड़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।

आज जिस बात पर इतना शोर है,
कल यहीं पर सन्नाटा होगा |
आज प्रश्न हुए हैं उजागर कई,
जवाब कब मिलेगा यह पता नहीं |

हाहाकार मचा चारों ओर आज,
कल यहीं ख़ामोशी का बजेगा साज़ |
फिर सन्नाटा छा जायेगा सभी पर,
जब तक एक चीख़ उठे नहीं किसी कोने में |

मानवता का अंत तो , हो गया इस कलयुग में,
क्या दैत्य अब पहनेंगे इंसान का चोला खुले में?
क्यों इंसानियत नहीं जागती सन्नाटे में,
किस ओर चला मानव और किस मुखौटे में |

हर इंसान अपने अंतरमन से पूछे,
क्या ऐसे भविष्य में हमें जीना हैं ?
जहाँ चीख़ को भी चुप करा देना
बस एक तमाशा है |

कल फिर सन्नाटा होगा हर जगह शांति छाएगी,
इस समय जाग जाये इंसानियत तो होगी भलाई |
मानवता के बीज को सब में पिरोना है,
दैत्य को पहचान उसे सबक सिखाना है |

इस शोर को शांत न होने दो मन में,
डटे रहो बदलाव की सहर में |
नारी को भगवान की पदवी की नहीं अपेक्षा,
बस इंसानियत और आदर की आकांक्षा |

मानव ! अपनी स्मर्ण बुद्धि सदा सचेत रख,
परिवर्तन की ओर कदम बढ़ा सम्मान की है ललक |
उपेक्षा ना कर नारी का इस युग में,
उठ जाएगी प्रलय की लहर हर कोने में |

यदि हम सभी सकारात्मक मानसिकता के लिए सामूहिक रूप से बदलाव की दिशा में काम करें और लिंग की पूर्व धारणाओं को तोड़ें तो दुनिया रहने के लिए एक खूबसूरत जगह होगी। प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करने वाले बच्चों का पालन-पोषण करना प्रत्येक माता-पिता की जिम्मेदारी है। बेहतर कल के लिए हम सभी को हुंकार भरते हुए वर्तमान में भी मेहनत करनी होगी और इंसान की सोच को भी बदलाव के साथ सकारात्मकता की ओर ले जाना होगा।

सारे खेल आज ख़त्म हुए,
जा बैठा राजू टक टकी लगाए,
गली के किनारे, अपने बाबा के,
इंतजार में दूर दूर तक निगाहें टिकाए।

बाबा के इंतज़ार में अब भूख़ का है ज़ोर।
क्या हो जाएगी आज फिर बिन मिले ही भोर।
क्या माँ से पूछूँ या करूँ थोड़ा और इंतज़ार?
नन्हे मन में आज उमड़े प्रश्नों के गुबार।

विचलित मन को आई राहत,
जब सुनी बाबा के पैरों की आहट।
देख झोली बाबा के हाथों में,
ख़ुशियाँ जैसे भर गई मासूम आँखों में।

झटपट राजू लिपट बाबा से माँ को आवाज़ लगाई,
आज क्या होगा झोली में सोच सोच मुस्काए।
माँ जल्दी से आज पका दे निकाल झोली से सब्जी,
तब तक सुन लूं मैं बाबा से कहानियाँ अनोखी।

आज निराशा की कहानी पढ़ आया हूँ,
तुझे कहाँ से मैं कोई आशा दूँ।
बेटा आज नहीं चुन पाया उन ढेरों से तेरे सपने,
बस लौटा हूँ बड़े ही हताश मन से।

नहीं कर पाया आज इकठ्ठा तेरे लिए चीज़ें,
झोली आज सुनी है मेरी जैसे मेरे हौंसले,
नाकामी का चिट्ठा सुन राजू को याद आया एक किस्सा,
बाबा का ही मंत्र आज उसने मासूमियत से परोसा।

बाबा झोली तो अपनी मेहनत और उम्मीद से सदा भरी,
फिर तू क्यों कहता ये झोली तेरी खाली पड़ी?
कल का सूरज देखना बाबा नई उम्मीद लाएगा,
जीवन हर दिन एक जैसा परीक्षा पत्र नहीं दे पाएगा।

चुन लेंगे बाबा कल फिर से स्वप्न उन अंबारों से,
सीखा है हौसलों को बांधना उन बिखरे हुए टुकड़ों से,
सुन राजू की बात आज एक बाप हुआ गर्वित,
जीवन की अस्थिरता से अब कोई नहीं चिंतित।

यह तो सबको पता है कि समय एक सा नहीं होता। जहां आंसू हैं वहां हंसी की फुहारें भी हैं। जहां रात की चादर हमें ढक देती है वहीं दिन फिर से आपको अपने पंख फैलाने और उड़ने की उम्मीद देता है। एक नए जोश और नए उत्साह से अपने कार्य को संपूर्ण करने की उम्मीद बांधता है। यह दृढ़ हौसला ही तो हमें अपने सपनों से मिलवाते हैं और बिना विचलित हुए परस्पर आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं।
इसी सोच और दृष्टिकोण के साथ आइए हम नए साल का स्वागत करें।

नए साल में नई उम्मीद से आगे बढ़े, न्यूनतम शुरूवात करें उन चीजों की, जो सकारात्मकता को बनाए रखे।

आपने कई बार अनुभव किया होगा एक ऐसी शक्ति जो जाने कहाँ से आप में नई ऊर्जा भर देती है। या ऐसे चमत्कार जो हमारे बिगड़े काम एक क्षण में पूर्ण कर देते हैं। प्रकृति की अद्भुत रचनाएँ हमें अक्सर अचंबित कर देती हैं। तो क्या आप भी मानते हैं कि ऐसा कुछ तो है जो हमारे साथ है, जो हमें पूर्ण करता है, जो हमें निरंतर सिखाता रहता है। हाँ, कुछ तो है….

कुछ तो है…
उन विशाल सागर की गहराइयों में,
उन समुद्र के विचित्र जीवों में,
उन अनंत जलाशयों के कौतूहल में,
निरंतर तट से टकराती लहरों में,
कुछ तो है।

कुछ तो है…
उन नीले अंबर की ऊंचाइयों में,
उन सफेद बादलों की कतारों में,
उन सूरज की तीव्र किरणों में,
लालिमा का आँचल ओढ़े नभ में,
कुछ तो है।

कुछ तो है…
उन अनकही बातों में,
उन पलों के एहसासों में,
उन बेसब्र नीली आंखों में,
मीठी सी मंद मुस्कुराहटों में,
कुछ तो है।

कुछ तो है…
उन अनदेखी अटूट क्षमताओं में,
उन अंधकार को ध्वस्त करते चिरागों में,
उन इच्छाशक्ति से भरे मन में,
गिर कर फिर से उठ जाने में,
कुछ तो है।

वह कुछ तो है…
अमूल्य, अतुल्य, सबसे परे,
इच्छा, क्रिया, ज्ञान की शक्ति,
पारदर्शी अंतर्मन के समीप,
आत्मविश्वास से अभिपूर्ण,
कुछ तो है,
हाँ, वह कुछ तो है

अच्छी बुरी परिस्थितियाँ जीवन के चक्र को पूर्ण करती हैं और हमें बहुत सारी सीख़ दे जाती हैं। कई बार ऐसा होता है कि हम गलत रास्ते की ओर आकर्षित हो जाते हैं लेकिन हमारी अंतरात्मा हमें गलत राह पर चलने से रोक देती है।

जाने क्या सूझा बटुवे को भला,
जा पहुँचा कालू की जेब में सुनकर उसकी व्यथा |

विचलित मन में जागेगी आशा की किरण,
आज ठानी करना सबके स्वप्न पूर्ण |

आशा भरी आँखें टकटकी लगाए,
चौखट की ओर देखती बिन पलक झपकाए |

आज तो इसके घर में होगी बहुत बहार,
छाएगी चाँदनी आँगन में इस बार |

जब हर सपने बिखरे जैसे रेत के टीले,
रास्ते ओझल और मार्ग हुए हटीले |

काँपते हाथों से कालू ने जब बटुवे को खोला,
प्यासी आँखों को जैसे सुकून ने टटोला |

मुन्ने की हठ और गुड़िया की पढ़ाई,
अर्धांगिनी की मुस्कुराहट बटुवे में नज़र आईं |

आज हर मर्ज़ की दवा है इन हाथों में,
जैसे फूल खिला हो उजाड़ आँगन में |

ना; यह क्या, सोच ज़रा यह तेरा तो नहीं,
किसी और के रास्ते पर अपनी मंज़िल नहीं |

बोला मन, कालू डिगना मत तू इस बार,
कहीं खो न जाए विश्वास अपनों का, होशियार |

इस मिले बटुवे की ललक ठीक नहीं है,
मेहनत में जो खुशी वो इसमें नहीं है |

बन्द कर बटुआ, बन्द कर दिए आकर्षण,
फेंका बटुवा दूर, सोचा ना फिर एक क्षण |

बटुवे ने ली विदा अपने दोस्त से,
बोला जल्द लौटूँगा सही तरीके से |

न डिगा पाया, न डिगा सकूँगा,
उस अटल मन पर नतमस्तक रहूँगा |

शब्दों की दुनिया बहुत विचित्र है, बहुत बड़ी भी है। अगर हम एक क्षण के लिए भी सोचें कि अगर शब्द नहीं होते तो क्या होता? तो आप कहेंगे कि फिर हम सब प्रेम कैसे दर्शाते, किसी को सहारा कैसे देते या किसी से अपने मन की बात कैसे करते। जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं बिलकुल वैसे ही, अगर शब्द नहीं होते तो शायद सबके दिल एक होते, कोई भेद भाव नहीं होते क्योंकि हम सारी बातें मन में ही छुपा जाते।

कुछ शब्द उजियारा फैलाते हैं,
कुछ शब्द परिर्वतन लाते हैं,
कुछ शब्द इतिहास रचाते हैं,
कुछ शब्द हमें महान् बनाते हैं।

कुछ शब्द दिल को चुभ जाते हैं,
कुछ शब्द हमें ढेस पहुँचाते हैं,
कुछ शब्द हमें सदा आंकते हैं,
कुछ शब्द आक्रोश फैलाते हैं।

कुछ शब्द संपूर्णता का एहसास कराते हैं,
कुछ शब्द सही गलत की पहचान कराते हैं,
कुछ शब्द अंतर समाप्त कर जाते हैं,
कुछ शब्द दो मन मिला जाते हैं।

कुछ शब्द सीमा पार कर जाते हैं,
कुछ शब्द समय के साथ बदल जाते हैं,
कुछ शब्द भ्रमित कर जाते हैं,
कुछ शब्द भेद भाव सिखलाते हैं।

कुछ शब्द जीवन के साज बन जाते हैं,
कुछ शब्द हमें सबसे आगे ले जाते हैं,
कुछ शब्द सपनों को पंख दे जाते हैं,
कुछ शब्द चेहरे पर मुस्कान लाते हैं।

कुछ शब्द कभी समझ नहीं आते हैं,
कुछ शब्द अकेले ही रह जाते हैं,
कुछ शब्द कभी मेल नहीं खाते हैं,
कुछ शब्द आंखों में आँसू दे जाते हैं।

कुछ शब्द कभी कहे नहीं जाते हैं,
कुछ शब्द आंखों की बोली बन जाते हैं,
कुछ शब्द दिलों के तार छू जाते हैं,
कुछ शब्द अनोखा भाव दे जाते हैं।

कुछ शब्द मन परिवर्तन कर जाते हैं,
कुछ शब्द दृष्टिकोण बदल देते हैं,
कुछ शब्द समय का मोल समझाते हैं,
कुछ शब्द नई ऊर्जा लाते हैं।

कुछ शब्द समन्दर से गहरे होते हैं,
कुछ शब्द निर्मलता का बखान करते हैं,
कुछ शब्द आदर्शों को सिखलाते हैं,
कुछ शब्द किसी का सहारा बन जाते हैं।

कुछ शब्द हम कभी कह नहीं पाते हैं,
कुछ शब्द गहरा राज़ छुपा जाते हैं,
कुछ शब्द बेड़ियों को तोड़ जाते हैं,
कुछ शब्द आज़ादी की ललकार बन जाते हैं।

कुछ शब्द मिलकर वाक्य बन जाते हैं,
कुछ शब्द विराट रूप ले पाते हैं,
कुछ शब्द बस कहीं लुप्त हो जाते हैं,
कुछ शब्द टकराकर वापस लौट आते हैं।

कुछ शब्द, बस….... कुछ शब्द,
जीवन के विचित्र रंग दिखलाते हैं।

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