किरण भागता-भागता घर आया और अपनी माँ की ओर आश्रय से देखने लगा, जैसे कुछ बताना चाहता हो। "क्या हुआ मेरे राजा बेटे को", पूछती हुई सुनीता आटा लगाने लगी और उसी में कल की बची हुई सब्जी डाल दी।
किरण ने झट से अपने स्कूल के बस्ते से एक नई किताब निकाली। किरण आगे से कुछ बोलता उससे पहले सुनीता बोल उठी “ये कहां से मिली तुझे? कोई बड़े लोग आए थे क्या? या किसी का जन्मदिन वहां मनाया गया?”।
किरण मुंह ताकता रह गया, कि मां को तो सब पता होता है, बिना मेरे बोले वो सब कुछ जान गई कि आज तीन बड़ी कारें आई थी और हमें किताबें, पेंसिल और अच्छा खाना खाने को मिला।
“हां मां, आज मेरी ही उम्र का लड़का वहां आया था लाल गाड़ी में बैठ कर। और पता है सबसे मज़े की बात उसका नाम भी किरण है।”
सुनीता अपने बेटे की आँखों में ख़ुशी और सवाल एक साथ पढ़ पा रही थी। अभी कुछ दिन पहले ही तो उसने अपनी पड़ोसन की मदद से किरण का सरकारी स्कूल में दाखिला करवाया था।
वैसे तो किरण को एक साल पहले ही पाँच साल की आयु में स्कूल जाना शुरू कर देना चाहिए था पर वह दो साल देरी से स्कूल गया था, इसके पीछे कारण तो वैसे कई हैं पर आज तक सुनीता अपने पति के व्यवहार को ही मुख्य कारण समझती है। सुनीता का पति काम पर जाता, कमता, फिर रात को सीधे शराब के ठेके पर अपनी कमाई को उड़ा देता, कभी बचे हुए कुछ रुपये लाकर सुनीता के हाथ में रख देता तो कभी गाल पर ज़ोर से एक थप्पड़ जड़ देता, जिसका कारण सुनीता आज तक नहीं समझ पाई थी। जब एक साल पहले वह मर गया तो सुनीता ने हिम्मत बांधी और काम करना शुरू किया और ठाना कि किरण को ऐसी सीख मिलेगी कि वह हर काम समझदारी से करेगा।
किरण अपनी मां का ध्यान अपनी और खींचता हुआ बोला, "मां देखो तो सही जो मेरी नई पुस्तक में यहां आम का रंग कितना पीला है और देखो ये तरबूज अंदर से कितना लाल है। पर हम तो जो आम लाते हैं वे तो अंदर से लाल और काले होते हैं और तरबूज़ पीले। ये किरण की मासूमियत ही थी जो अपनी मां को फलों के रंग समझा रहा था।
सुनीता भी पूरे ध्यान से किरण की बातें सुन रही थी।
किरण ने बड़े उत्साह से खाने में क्या-क्या खाया यह बताया और बड़ी सी चॉकलेट भी दिखाई। जब सुनीता ने पूछा ये स्कूल में क्यों नहीं खाई तो बड़े प्यार से मां को स्नेहमय अलंगिन करके बोला मां तेरे साथ जो खानी थी और फिर बोल उठा…मां परांठे रात को खा लूंगा और बैठ गया नई किताब पढ़ने।
किरण ने पूरे दिन का वर्णन किया, एक बार भी अपनी माँ से यह प्रश्न नहीं किया कि माँ हम ऐसे क्यों रहते हैं और हमारे पास कब सब कुछ होगा क्योंकि सुनीता ने उसे यह सिखाया था कि जितना है उतने में खुश रहना चाहिए।
अपनी मनोस्थिति का ही आसरा था सुनीता के पास जिसका उपयोग उसे जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति दे रहा है और वही सकारात्मक मनोस्थिति सुनीता अपने बेटे में आत्मसात कर रही थी।
और दूसरी ओर जो किरण का परिवार उसको जन्म दिन पर सरकारी स्कूल लाए थे वो अपने बच्चे में कृतज्ञता और सद्भावना को आत्मसात करने आए थे।
हम बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य (हॉलिस्टिक वैलनेस) जैसे गुण बचपन से उनके मन में एकाग्र कर सकते हैं। फिर चाहे आम पीला हो या लाल, स्वाद आपके मन से आएगा।
यह ब्लॉग पोस्ट ट्रूली योर्स हॉलिस्टिक इमोशन्स ब्लॉग के लिए लिखा गया है, जिसे राखी जयशंकर और रोमा गुप्ता सिन्हा ने होस्ट किया है।
सरल व्यक्तित्व, सादा जीवन, कठिन परिश्रमी और शान्ति के दूत; जी हां यह कोई और नहीं बल्कि हमारे अपने गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री जी हैं जिनकी विचारधारा आज तक सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है।
सरल जीवन, उच्च विचार,
कांपे अंग्रेज सुन शान्ति की ललकार।
देश के आगे और कुछ न सूझा,
लहराया विजयी पताका ऊंचा।
एकता और अखंडता का पाठ सिखाया,
न उठाई लाठी न कोई टकराया,
उनके धैर्य के आगे न कोई टिक पाया,
इतनी गौरवशील थी जिनकी काया।
आईए जानें महात्मा गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन की ऐसी कई विशेषताएं जिनका यदि पूरी निष्ठा से पालन किया जाए तो व्यक्ति जीवन में सुखी रह सकता है।
लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता, विनम्रता, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्ति के लिए माने जाते हैं। देश के प्रधान मंत्री के रूप में उनकी दूरदर्शिता ने देश को प्रगति का मार्ग दिखलाया।
अनुशासन एक बहुमूल्य गुण है जो जीवन में कुशलता और आत्मविश्वास से आगे बढ़ने की क्षमता का सार्थक है। एक अनुशासित नागरिक अपने देश के कुशल भविष्य की अहम पूंजी है। ऐसी ताकत को परास्त करना नामुमकिन है।
पाठ १: अनुशासन की आदत जीवन को संवार देती है।
शास्त्री जी की सादगी और दृढ़ता का पाठ सबके लिए आज तक प्रेरणा का स्त्रोत है। देश के नागरिकों को एक दिशा दिखाने के लिए वे सर्वप्रथम खुद किसी कार्य को करने में सदा तत्पर रहते थे। देश के प्रधानमंत्री होने के नाते उन्होंने लोगों को सिखाने के लिए अपने आपको हर कार्य में आगे रखा।
पाठ २: किसी को अगर कोई बात सिखानी हो तो उस पर पहले खुद को अमल करना चाहिए।
शास्त्री जी का सर्वप्रथम उद्देश्य देश में शान्ति और खुशहाली का पाठ लोगों को सिखलाना था। शांत मन हर कठिन परिस्थिति से निकलने में सक्षम होता है। जब मन शांत होगा तभी एकाग्रता से कार्य कर पाएगा।
पाठ ३: हमें हर पल आंतरिक और बाहरी शान्ति को पाने की कोशिश करनी चाहिए।
सब साथ चलेंगे, सब साथ परिश्रम करेंगे तो पथरीले रास्ते भी आसानी से पर हो जाते हैं। एकता में जो शक्ति है वह और कहीं नहीं है, और यही कारण था की हमारा देश आजाद हो पाया।
पाठ ४: हर कार्य अकेले करना संभव नहीं होता। एकता की शक्ति सर्वोपरि है।
भारत में राष्ट्रपिता के नाम से लोकप्रिय महात्मा गांधी ने दुनिया भर के अरबों लोगों को उनके सिद्धांतों पर जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है।
हम सभी ने देखा है कि गांधीजी की मानसिक शक्ति इतनी मजबूत थी कि जब दूसरे देशों में गांधीजी के बारे में सुनने वाले लोग अक्सर उनकी शारीरिक बनावट को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे। बापू एक आदर्श उदाहरण हैं जो बताते हैं कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो भौतिक क्षमता की परवाह किए बिना पहाड़ों को भी हिलाया जा सकता है।
पाठ 1: जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए अपनी मानसिक शक्ति मजबूत रखें।
अगर प्रयास पूरे मन से किया जाय तो जीत निश्चित है। हां, गांधीजी के जीवन ने हमें सिखाया कि प्रयासों में संतुष्टि ही जीवन की कुंजी है। हालाँकि हमारे देशवासियों ने आज़ादी के लिए वर्षों तक संघर्ष किया, लेकिन निरंतर प्रयासों से ही यह संभव हो सका। यदि आप विजयी परिणाम चाहते हैं तो अपना 100% देते रहें।
पाठ 2: अंत में विजयी परिणाम के लिए अपने प्रयासों में संतुष्टि रखें।
गांधीजी एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी कुछ जरूरतें नहीं थीं और वह अपने हमेशा चमकते मुस्कुराते चेहरे के साथ एक खुशहाल जीवन जीते थे। कठिनतम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी आवश्यकताओं को सरल रखा। इससे उनका ध्यान देश के अन्य ठोस मुद्दों पर केंद्रित रहता था।
पाठ 3: जीवित रहने के लिए पर्याप्त होना खुशी की कुंजी है।
गांधी जी स्वाभिमान के साथ अपनी उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं।
स्वाभिमान, स्वयं से प्रेम करना है। जब हम खुद का सम्मान करते हैं और अपने कार्यों को महत्व देते हैं तभी कोई व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ कई चीजें हासिल कर सकता है। एक विनम्र व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति को जानने के लिए किसी झूठी प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए स्वयं को पहले रखें और देखें कि परिस्थितियाँ कैसे बदलती हैं।
पाठ 4: आत्मसम्मान जीवन जीने की कुंजी है।
सुखी जीवन जीने के लिए गांधीजी और शास्त्री जी के सिद्धांत उल्लेखनीय हैं और इन्हें जीवन में अपनाना चाहिए। यह अमूल्य बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आशा, स्वतंत्रता, भक्ति, सच्चाई और आत्म-सम्मान पैदा करती हैं। आइए हम सभी खुशहाल जीवन जीने के लिए उनके कुछ सिद्धांतों का पालन करने का प्रयास करें और स्वयं से वादा करें की हम यह सीख अपने आने वाली पीढ़ी को अपना कर उनके लिए एक उदहारण बनें।