दो साल की कड़ी मेहनत के बाद आज वो दिन था, रिज़ल्ट का दिन और राजेश की उम्मीदों का दिन। घर में अजीब सी खामोशी थी। सबकी नज़रें उस लैपटॉप स्क्रीन पर टिकी थीं, जहाँ एक नंबर उनकी किस्मत तय करने वाला था। माँ चुपचाप भगवान से प्रार्थना कर रही थीं, अप्पा बार-बार घड़ी देख रहे थे, और छोटी संध्या कुछ समझ न पाने के बावजूद माहौल को महसूस कर रही थी।

वैसे तो राजेश को अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल ही जाता, लेकिन उसकी जिद थी, “जाऊँगा तो सिर्फ वेल्लोर के इंजीनियरिंग कॉलेज में।”

एक दिन संध्या ने पूछ ही लिया था, “अन्ना, ऐसा क्या है उस कॉलेज में जो तुम मेरे साथ क्रिकेट भी नहीं खेलते और मम्मी-पापा के साथ शॉपिंग भी नहीं जाते?”

राजेश मुस्कुरा दिया, लेकिन जवाब नहीं दे पाया। कैसे समझाता 6 साल की बच्ची को कि वो अपने दादा के नक्शे कदम पर चलना चाहता है कि वो देश के विज्ञान में कुछ बड़ा करना चाहता है कि उसका सपना सिर्फ एक कॉलेज नहीं, एक पहचान है।

कमरे में कूलर की ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन तनाव के कारण सबके माथे पर पसीना था।

अचानक स्क्रीन पर रिज़ल्ट आ गया।

कुछ सेकंड के लिए जैसे समय रुक गया।

राजेश की आँखें स्क्रीन पर जम गईं फिर वो पीछे हटा उसकी आँखों में आँसू थे। उसने बिना कुछ कहे अपनी माँ को गले लगा लिया और रोने लगा।

संध्या ने धीरे से सोचा, “अन्ना फेल हो गए अब रसगुल्ले नहीं आएँगे”

लेकिन तभी उसने देखा अप्पा मुस्कुरा रहे थे। वो हैरान हो गई।

अप्पा ने आगे बढ़कर राजेश के कंधे पर हाथ रखा और बोले, “राजेश, तुमने तो हमारा नाम रोशन कर दिया!”

राजेश ने आँसू पोंछते हुए कहा, “लेकिन अप्पा मेरा वेल्लोर में सिलेक्शन नहीं हुआ”

अप्पा हँसे, “बेटा, ज़िंदगी सिर्फ एक कॉलेज का नाम नहीं होती। तुमने इतनी मेहनत की, इतना अच्छा स्कोर किया ये ही हमारी जीत है। तुम्हारे दादा भी यही चाहते थे कि तुम सीखो, आगे बढ़ो न कि सिर्फ एक जगह पर अटक जाओ।”

माँ ने भी कहा, “और ये आँसू? ये हार के नहीं हैं ये तुम्हारी मेहनत के हैं। हमें तुम पर गर्व है।”

संध्या अब भी कन्फ्यूज थी, लेकिन उसने धीरे से पूछा, “तो रसगुल्ले आएँगे?”

सभी हँस पड़े।

राजेश ने पहली बार हल्कापन महसूस किया। उसने संध्या को गोद में उठाया और कहा, “हाँ, इस बार दो डब्बे आएँगे!”

कुछ दिन बाद राजेश ने एक दूसरे अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले लिया। शुरुआत में उसका मन थोड़ा उदास था, लेकिन धीरे-धीरे उसने समझ लिया कि सपनों का रास्ता एक नहीं होता।

चार साल बाद......

एक साइंस एग्ज़िबिशन में राजेश का प्रोजेक्ट पूरे देश में सराहा गया। उसके काम को देखकर लोग हैरान थे।

भीड़ में खड़ी संध्या ने गर्व से कहा, “ये मेरे अन्ना हैं!”

राजेश ने मंच से नीचे देखते हुए अपने परिवार को देखा, माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे, और अप्पा उसी मुस्कान के साथ खड़े थे। उसने मन ही मन सोचा, “शायद वेल्लोर नहीं जाना था क्योंकि मेरी मंज़िल कहीं और थी।”

और उस दिन उसे समझ आया, सपने जगह से नहीं, मेहनत से पूरे होते हैं।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

बरगद के पुराने पेड़ पर हर सुबह चहचहाहट का एक मेला लगता था। चिड़ियों का झुंड पास के खेतों से दाने चुगकर लौटता, और फिर दिन भर अपने-अपने काम में लग जाता। उनमें एक चतुर गौरैया थी, छोटी, फुर्तीली, और कुछ अलग तरह की सोच रखने वाली।

एक दिन गाँव के बूढ़े किसान ने अपने आँगन में मुट्ठी भर दाने बिखेर दिए। दाने साफ, चमकदार और आसानी से मिल जाने वाले थे। गौरैया ने देखा, चोंच में भरकर खा लिया। उसे लगा, “इतनी मेहनत किसलिए, जब यहाँ बिना खोजे सब मिल रहा है?”

अगले दिन वह फिर वहीं आ गई। अबकी बार दाने थोड़े ज्यादा थे। उसने जल्दी-जल्दी खाए और लौट आई। धीरे-धीरे उसकी आदत बदलने लगी। अब वह खेतों की ओर कम जाती, और आँगन की ओर ज्यादा।

बाकी चिड़ियाँ पहले तो हँसीं, “आजकल बड़ी आरामतलब हो गई हो।”
गौरैया मुस्कुराकर रह जाती, “तुम भी आ जाओ, वहाँ सब आसान है।”

कुछ दिन बाद, किसान ने दानों के साथ एक छोटी-सी टोकरी भी रख दी, जिसके नीचे पतली-सी लकड़ी टिकी थी। दाने उसके अंदर भी थे। गौरैया ने एक पल को ठिठककर देखा, फिर सोचा, “इतना अच्छा मौका बार-बार कहाँ मिलता है।”

वह टोकरी के भीतर चली गई।

जैसे ही उसने चोंच झुकाई, लकड़ी खिसक गई और टोकरी धप्प से गिर पड़ी। बाकी चिड़ियाँ पेड़ से देखती रह गईं। कुछ देर तक भीतर फड़फड़ाहट होती रही, फिर सब शांत हो गया।

अगली सुबह, वही आँगन फिर दानों से भरा था। चिड़ियाँ आईं, पर इस बार उनकी चहचहाहट में पहले जैसा उत्साह नहीं था। एक बुजुर्ग चिड़िया धीरे से बोली, “दाना वही है, पर रास्ता बदल गया है।”

किसी ने जवाब नहीं दिया। सबने थोड़ा-थोड़ा खाया, और जल्दी ही उड़ गईं।

पेड़ पर लौटकर भी देर तक कोई कुछ नहीं बोला। हवा चल रही थी, पत्ते हिल रहे थे, पर चहचहाहट जैसे कहीं खो गई थी।

उस दिन के बाद, चिड़ियाँ फिर खेतों की ओर जाने लगीं। दाने कम मिलते थे, पर तलाश अपनी थी। उड़ान थोड़ी लंबी थी, पर आसमान खुला था।

और आँगन में बिखरे दाने…
अब भी हर सुबह चमकते थे, बस उन्हें देखने वाली निगाहें बदल गई थीं।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

गुस्सा एक साधारण सी बात को उलझा देता है। गुस्से पर काबू रखना कठिन है किंतु नामुमकिन नहीं। गुस्सा एक तीव्र अभिव्यक्ति है जिसको कई लोग छुपा नहीं पाते और छोटी - छोटी बात पर लाल पीले हो जाते हैं। अक्सर, गुस्सा एक साधारण सी बात को बहुत बड़ा बना देता है। महात्मा गांधी जी का यह कहना है कि मूर्ख मनुष्य क्रोध को जोर-शोर से प्रकट करता है, किंतु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है। 

आप यह सोच रहे होंगे की मैं गुस्से पर बातें क्यों कर रही हूँ। दरअसल, इसी बात पर एक बहुत ही अद्भुत किस्सा आपको बताना चाहती हूँ। इसके बारे में मैंने कहीं पढ़ा था और मुझे यह बहुत ही प्रेरणादायक लगा। 

एक बार गांधी जी अपने दफ्तर में बैठे कुछ लिख रहे थे। यह उनका रोज का नियम था और दिन भर में उनसे बहुत सारे लोग किसी न किसी काम से मिलने आया करते थे। गांधी जी के समक्ष कोई अपनी परेशानी लेकर आता तो कोई कुछ प्रस्ताव लेकर।

एक दिन एक व्यक्ति बड़ी जल्दी में रिक्शे से उतरा और तमतमाता हुआ गांधी जी के दफ्तर के कक्ष की ओर बढ़ने लगा। उसके हाथ में एक लाल रंग की फाइल थी। उस व्यक्ति ने आव देखा न ताव और कक्ष के दरवाजे को ज़ोर से धक्का देकर गांधी जी के कमरे में घुस गया। उस आदमी को कोई बात खटक रही थी और अपनी बात रखने के लिए वो वहाँ जा पहुँचा।

गांधी जी के पूछने पर उसने कुछ बोले बिना लाल फाइल में से कुछ पन्ने गांधी जी के समक्ष रख दिए। गांधी जी ने उन पन्नों पर ध्यान नहीं दिया और वापस लिखने बैठ गए। अब उस व्यक्ति का गुस्सा उबाल पर था, वो गांधी जी को खरी खोटी सुनने लगा। गांधी जी बड़े ही शांति से उसकी बातें सुन रहे थे, उन्होंने अपने मुँह से एक शब्द भी नहीं निकाला।

गांधी जी ने उसके दिए हुए पन्नों में लगी ऑलपिन को निकाल कर अपने पास रख लिया और सभी कागज लौटा दिए। उस व्यक्ति का पारा और भी चढ़ गया और गांधी जी के ऐसा करने का कारण पूछा। गांधी जी बड़ी सहजता से बोले, "मैंने काम की चीज़ रख ली है बाकी तुम अपने साथ वापस ले जाओ। यहाँ सिर्फ इस ऑलपिन के अलावा मुझे कुछ भी उपयोगी नहीं लगा।"

अगले ही पल उस व्यक्ति को अपने किए का एहसास हो गया। उसे सबक भी मिल गया कि गुस्सा अपनी बात रखने का सही तरीका नहीं है। गुस्से को महत्व कभी नहीं मिलता, गुस्सा प्रतीक है असमंजस का, असंतुलन का, विभ्रान्ति का, इसीलिए उसका कोई मोल नहीं। 

ब्लॉग पर किस्से और कहानियों का आनंद जरूर लीजिये।

संतुष्ट मन सबसे बड़ा वरदान है जिसमें जीवन की सारी खुशियाँ छुपी हैं।

किस्से जो परिवर्तन की लहर आपके अंदर उत्पन्न करें वे बहुत खास होते हैं। हम उन्हें कभी भूल नहीं पाते और वे हमारे प्रेरणा का स्त्रोत बन जाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा आज आपके साथ साझा करना चाहती हूँ ।

एक बार मैं स्कूल के बाहर अपनी गाड़ी में बैठी बैठी मेरी बेटी के आने का इंतजार कर रही थी। मैं थोड़ा जल्दी पहुँच गई थी, रास्ते में और भी काम थे जो जल्दी खत्म हो गए थे, ट्रैफिक भी रोज से कम मिला था। अभी काफी समय बचा था स्कूल की छुट्टी होने में। गाड़ियों की लंबी कतारों ने सभी पार्किंग की जगहों को रोक रखा था। मुझे दूर-दूर तक कहीं भी गाड़ी पार्क करने की जगह नहीं दिखाई दे रही थी। क्योंकि समय अभी काफी बाकी था तो मैंने अपनी गाड़ी स्कूल से थोड़ी दूर एक पेड़ की छाया में लगा दी और पुस्तक पढ़ने लगी।

मेरे बिल्कुल सामने एक बड़ी सी सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी। वो भी पार्किंग की जगह टटोल रही थी। इतने में एक कार की जगह खाली हुई और उस सफ़ेद गाडी वाले ने उस खाली जगह पर कार पार्क कर दी। मैं मन ही मन यह सोचने लगी कि, मेरी तो किस्मत ही खराब है। मैं यहाँ इतनी देर से इंतजार कर रही हूँ, लेकिन मुझे पार्किंग की जगह नहीं मिली और देखो उस गाड़ी वाले की किस्मत आते ही पार्किंग तैयार। कब मिलेगा जो मुझे चाहिए? ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है? जिधर देखो सबके पास आज सबकुछ है लेकिन मेरे पास तो………….तेज हॉर्न की आवाज मुझे अपने ख्यालों से वापस ले आई।

मैने देखा कि उस सफ़ेद कार से दो बच्चे बड़े हँसते खेलते अपनी माँ के साथ उतरे। उनकी माँ ने उन्हें सड़क पार करने से मना किया और उनका हाथ थाम कर एक तरफ खड़ी हो गई। ड्राइविंग सीट से धीरे से एक व्यक्ति उतरे, मुझे ठीक से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि वे दूसरी तरफ थे।

मुस्कुराते हुए जब वे व्यक्ति सड़क पार करने के लिए सामने आए तो मैं चकित रह गई। वे एक पैर से लाचार थे, बैसाखी की सहायता से वे चल पा रहे थे। बड़े ही प्यार से बच्चों ने अपनी माँ और पिता के साथ सड़क पार की और स्कूल के गेट से अंदर चले गए।

यह दृश्य मानो मेरे मन को छू गया। उनको देख मुझे बहुत शर्म आने लगी, अपने आप पर बहुत क्रोध भी आया। अभी थोड़ी देर पहले मैं अपनी किस्मत को कोस रही थी पर आज मुझे पता चल गया कि मैं कितनी गलत थी। शारीरिक रूप से अक्षम हो कर भी वे व्यक्ति कितने संतुष्ट दिखाई दे रहे थे। इतनी विपरीत परिस्थिति में भी उनके चेहरे पर तेज था और आंखों में चमक थी। मुझे यह सीख मिल गई की चाहे कुछ भी हो अपनी उम्मीदों और हौसले को बुलंद रखना चाहिए।

बस, उस दिन के बाद से मैं ईश्वर से संतुष्ट मन और दृढ़ आत्मविश्वास की मनोकामना करने लगी।

क्या आपके साथ भी कोई ऐसी घटना हुई है जिसने आपके नजरिये को बदल दिया हो? अगर हाँ, तो हमसे जरूर शेयर करें।

यहाँ आप पढ़ सकते हैं कि सकारात्मक सोच का जीवन में कितना महत्व है।

santusht mann, man, satisfaction in life, short story in hindi, संतुष्ट मन, self-satisfaction

Proudly designed with Oxygen, the world's best visual website design software
linkedin facebook pinterest youtube rss twitter instagram facebook-blank rss-blank linkedin-blank pinterest youtube twitter instagram