सच्ची खुशी और अपनापन किसी साधन या आधुनिक सुविधा में नहीं, बल्कि इंसानों के रिश्तों और भावनाओं में होता है। हमें अपने अतीत और उन लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने हमारी ज़िंदगी को खूबसूरत बनाया।
पीपलिया गाँव की धूल भरी कच्ची सड़क पर हर सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ एक जानी-पहचानी आवाज़ गूँज उठती थी,
टिन… टिन…, एक साइकिल की घंटी, जो जैसे पूरे गाँव को यह बता देती थी कि रामू अपनी रोज़ की यात्रा पर निकल चुका है।
गाँव के लोग बिना देखे ही पहचान जाते थे कि यह रामू की साइकिल है, क्योंकि उस आवाज़ में एक अजीब-सी लय थी, जैसे वह सिर्फ घंटी नहीं, बल्कि बचपन की खुशियों का ऐलान हो।

रामू हर रोज़ बच्चों को स्कूल छोड़ता था। बच्चों के लिए साइकिल की सवारी किसी झूले से कम नहीं थी, क्योंकि उस पर बैठकर वे सिर्फ सफर नहीं करते थे, बल्कि हर दिन एक नई छोटी-सी दुनिया जीते थे।
गाँव के लोगों को समझ नहीं आता था कि आखिर पुरानी, जर्जर साइकिल, जिसका हैंडल थोड़ा टेढ़ा, सीट जगह-जगह से सिली हुई, और चरमराहट करती चेन की यात्रा बच्चों को कैसे लुभाती है।
बच्चे रास्ते भर हँसते, गाते, कभी पेड़ों की गिनती करते, तो कभी यूँ ही बिना किसी वजह के घंटी बजाते रहते, टिन… टिन… टिन…, और रामू बस उन्हें देखकर मुस्कुराता रहता, जैसे उनकी हर खुशी ही उसकी सबसे बड़ी कमाई हो।
लेकिन समय हमेशा एक-सा नहीं रहता, और एक दिन पीपलिया भी बदलने लगा, धीरे-धीरे, बिना किसी शोर के।
कच्ची सड़क की जगह पक्की सड़क बन गई, और उसके साथ गाँव में एक नई, चमचमाती स्कूल वैन आ गई, जो तेज़ थी, आरामदायक थी, और देखने में आधुनिक भी।
धीरे-धीरे बच्चों ने रामू की साइकिल पर बैठना छोड़ दिया, और वे वैन में जाने लगे, जहाँ वे खिड़की से बाहर तो देखते थे, लेकिन उनकी हँसी और शोर कहीं पीछे छूट गया था।
अब रामू की साइकिल की घंटी कभी-कभार ही सुनाई देती थी, और वह भी पहले जैसी चहकती नहीं, बल्कि जैसे थकी हुई-सी लगती थी।
फिर एक दिन वह आवाज़ पूरी तरह से बंद हो गई, और उसी के साथ रामू भी गाँव से गायब हो गया, जैसे वह कभी था ही नहीं।
लोगों ने बस इतना कहा कि शायद वह शहर चला गया होगा, और धीरे-धीरे सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।
उसकी साइकिल कई दिनों तक उसके घर के बाहर यूँ ही खड़ी रही, धूल में लिपटी हुई, जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो और फिर एक सुबह वह भी गायब हो गई, बिना कोई निशान छोड़े।
समय बीतता गया, और यादें भी धीरे-धीरे धुंधली होने लगीं।
सालों बाद, मोहन, जो कभी उसी साइकिल पर बैठकर स्कूल जाया करता था, शहर से वापस पीपलिया लौटा, अब एक बड़ा आदमी बन चुका था, लेकिन उसके अंदर कहीं न कहीं वह छोटा बच्चा अब भी ज़िंदा था।
एक सुबह वह उसी सड़क पर टहल रहा था, जहाँ कभी उसकी हँसी गूँजा करती थी, और तभी अचानक हवा में एक जानी-पहचानी आवाज़ तैर गई,
टिन… टिन…
मोहन ठिठक गया, क्योंकि यह आवाज़ सिर्फ एक आवाज़ नहीं थी, बल्कि उसकी यादों का दरवाज़ा थी, जो अचानक फिर से खुल गया था।
उसने दूर देखा, और जो उसने देखा, उससे उसका दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया, वही पुरानी साइकिल, वही टेढ़ा हैंडल, वही पैबंद लगी सीट, लेकिन उसे चलाने वाला कोई नहीं था, और फिर भी वह साइकिल बिल्कुल संतुलन के साथ आगे बढ़ रही थी।
उस साइकिल के पीछे दो छोटे बच्चे बैठे थे, जो हँस रहे थे, बातें कर रहे थे, जैसे उनके लिए यह सब बिल्कुल सामान्य हो, जैसे यह दुनिया का सबसे साधारण दृश्य हो।
मोहन धीरे-धीरे उनके पास पहुँचा, और उसकी आवाज़ में एक हल्का-सा डर और हैरानी घुली हुई थी, जब उसने पूछा, “तुम्हें डर नहीं लगता?”
बच्चों में से एक हँस पड़ा, जैसे उसने कोई बहुत मज़ेदार बात सुन ली हो, और उसने मासूमियत से जवाब दिया,
“क्यों? रामू काका हैं ना!”
मोहन का दिल तेज़ी से धड़कने लगा, और उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा,
“लेकिन… रामू काका तो यहाँ नहीं हैं…”
बच्चे ने उसे अजीब नज़रों से देखा, जैसे मोहन ही कुछ समझ नहीं पा रहा हो, और फिर बोला,
“आपको दिखते नहीं? वो तो रोज़ हमें स्कूल छोड़ते हैं।”
मोहन ने एक बार फिर ध्यान से उस साइकिल को देखा, और इस बार उसे ऐसा लगा जैसे साइकिल के हैंडल पर किसी के हाथों के हल्के-हल्के निशान हों, जैसे कोई अदृश्य मौजूदगी उसे थामे हुए हो।
हवा में वही पुरानी, हल्की-सी हँसी गूँज रही थी, जो कभी उसके बचपन का हिस्सा हुआ करती थी,
टिन… टिन…
मोहन ने पीछे मुड़कर देखा, नई सड़क, तेज़ रफ्तार वैन, और बदलती हुई दुनिया और फिर उस साइकिल को, जो बिना किसी दिखने वाले सहारे के आगे बढ़ रही थी, जैसे समय उसे रोक नहीं पाया हो।
उसी पल उसे एहसास हुआ कि कुछ लोग भले ही इस दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन उनके रास्ते, उनके सफर, और उनके दिए हुए एहसास कभी खत्म नहीं होते, बल्कि किसी न किसी रूप में हमेशा हमारे साथ चलते रहते हैं।
और शायद रामू अब भी बच्चों को सिर्फ स्कूल नहीं पहुँचा रहा था, बल्कि उन्हें उस सच्ची खुशी तक ले जा रहा था, जिसे कोई भी आधुनिक सुविधा कभी नहीं दे सकती।
टिन… टिन…
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"सुबह सुबह अदरक वाली चाय का स्वाद ही कुछ और है", किशोर के हाथों में चाय का प्याला आते ही होटों पर जैसे मुस्कुराहट छा गई।
"हर सुबह बस यही बोलते हो", मालती अपनी चाय के प्याले को ट्रे से उठाने के लिए बढ़ी।
"सच ही तो है, जब तक अदरक वाली चाय न मिले दिन शुरू नहीं होता", किशोर को जैसे सारे सुख मिल गए।
"जरा बाबूजी से सीखो वे तो अपने दोस्तों के साथ सैर पर एक घंटे पहले ही चले गए और उससे पहले योग भी करते हैं, और आपकी सुबह अब हो रही है", मालती चाय की चुस्कियां लेते हुए रसोईघर की ओर यूं नज़र मारी जैसे उसकी एक झलक से रुका हुआ काम आगे बढ़ जाएगा।
अब जाकर रोटी बना दूंगी और फिर बाबूजी के लिए चाय, दोपहर के लिए दही जमाना और…,वह आगे के काम अपने मन में सोच ही रही थी कि किशोर की आवाज़ से चौंक उठी। "तुम मुझे कहती हो सैर करने के लिए खुद क्यों नहीं रसोईघर का मोह त्याग के चलती हो मेरे साथ सैर पर। मुझे अकेले कहां अच्छा लगता है सेर करना", किशोर ने आज जवाब सोच रखा था।
"वाह जी वाह..मेरा बहाना ले रहे हो…आप अपनी सुबह की मीठी नींद क्यों नहीं त्याग देते और अगर मैं सैर पर चली तो गुड्डी का टिफिन कौन बनाएगा।"
दरअसल मालती जल्दी से सारा काम निपटा कर अपने लिए समय निकालती और पेंटिंग करती। उसका शौक कब लोगों को इतना पसंद आने लगा की अब उसे बहुत सारे ऑर्डर आने लगे।
गुड्डी भागते हुए आई और अपने दादा जी के लिए पूछने लगी, तो पता चला वे अभी तक सैर से नहीं आए हैं। उसकी स्कूल बस का टाइम हो रहा था, अपना टिफिन बैग में रखते हुए थोड़ी थोड़ी परेशानी सी थी। तभी उसने अपने दादा की आने की आहट सुनाई दी।झट से उनके पास गई और अपना हाथ आगे कर दिया और दादाजी ने जेब से गेंदे का फूल उसके हाथ में थमा दिया।
"दादा की लाडली", किशोर और मालती एक साथ बोल पड़े और सबकी हंसी छूट गई।
गुड्डी हर रोज़ एक फूल अपनी स्कूल की सहायक, शीला आंटी के लिए ले जाया करती थी। गुड्डी को शीला आंटी से एक अनोखा नाता लगता था। उसने शीला आंटी की आँखों में दुःख को भाँप लिया था, आखिर वह अपने दादा जी से सभी को समान भाव से देखने की बातें सुना करती थी।
जब गुड्डी ने देखा कि सभी बच्चे अपनी टीचर को तो कई प्रकार के तोहफे देते लेकिन शीला आंटी जो सबके लिए कितना काम करती है उन्हें कभी कोई कुछ नहीं देता था। उसने सोचा क्यों न मैं रोज़ उन्हें फूल दूँ तो उन्हें कितना अच्छा लगेगा। बस, तभी से गुड्डी की रोज़ बिना भूले अपनी आंटी को सुप्रभात कह कर फूल देने की शुरुवात हुई।
एक लघु कथा जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे - सबसे बड़ी भूख।
कौन किस मोह से बंधा था ये जान पाना मुश्किल था किशोर की नींद का भाव या मालती की पेंटिंग का, दादाजी के सैर या गुड्डी का दादाजी से और अपने टीचर से। सब किसी ना किसी मोह के धागे से बंधे हुए थे।
हर सुबह की तरह यह सुबह भी बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हुई।
एक दिन जब मालती के टेस्ट में शुगर निकली तो डॉक्टर ने कह दिया सुबह सैर करने से तबीयत में सुधार आएगा। और उसकी शाम दादाजी के पैर में मोच आने से उन्हें आराम करने को कहा। सब यह सोच रहे थे कि अब दिन कैसे चलेंगे।
दादाजी सुबह की सैर के साथ साथ अपने दोस्तों को याद करेंगे, तो किशोर को अपनी नींद त्याग कर सुबह मालती के संग सैर पर जाना पड़ता था। वहां गुड्डी परेशान थी कि अब कौन रोज रोज उसके लिए फूल लाएगा, क्योंकि यह एक छोटा सा राज था उसके और दादाजी के बीच।
अब घर के सभी सदस्यों को अपने-अपने मोह को त्याग एक नई दिनचर्या को अपनाना था। सभी के मन में असमंजस बना हुआ था नई पहल के लिए।
एक दो दिन तो सबके बस निकल ही रहे थे, फिर दादाजी ने देखा इसका तोड़ तो निकलना पड़ेगा, क्योंकि मोह के बिना तो कोई भी सुखी नहीं लग रहा था।
दादाजी ने दोस्तों को घर पर बुलाना चालू कर दिया। किशोर ने अपनी और बाबूजी की चाय बनानी शुरू कर दी और साथ ही साथ गुड्डी के टिफिन बनाने का जिम्मा भी ले लिया।
दादाजी के दोस्त घर आ जाते फिर वो मिल कर पीछे आंगन में प्राणायाम करते और गप्पे मारते। मालती अब बड़ी तसल्ली से सैर पर जाती और उसे अपनी पेंटिंग के लिए नई नई प्रेरणा मिलती। लौटते हुए वो भगवान के लिए जो पुष्प लाती उसमें से गुड्डी एक फूल ले जाती स्कूल अपनी दोस्त के लिए।
सभी अपने मोह से जुड़ भी गए और अपनी बरसों की आदतों को त्याग भी दिया। तो क्या यह कहना सही होगा कि मोह और त्याग समय से बदल जाते हैं क्योंकि सबको अंत में खुश रहना ही जीवन का मूल मंत्र है।
हर मनुष्य जीवन में न जाने कितने मोह से बंधा हुआ होता है, जैसा की आपने अभी अभी इस कहानी में देखा। लेकिन परिस्थियों के अनुसार अपने अपने मोह का त्याग कर एक नए दृष्टिकोण से जीवन को जीना ही सबसे बड़ा सुख और खुशी का कारण होता है। हर कठिनाई का निवारण हम मैं ही है, और इसमें पूरे परिवार का साथ भी जरूरी है। कभी कभी अपने मोह से बाहर निकल कर हम देखें तो जीवन कितना सुंदर, सरल और सुलझा हुआ दिखाई देगा।
यह ब्लॉग पोस्ट स्पीक ईजी ३.० के लिए लिखा गया है| इसे दीपिका सिंह (www.gleefulblogger.com) और रुचि वर्मा (www.wigglingpen.com) ने होस्ट किया है।
बच्चों की रंगीन दुनिया बहुत निराली है, सरल और सहज। काश हम बड़ों के दिल भी इतने सुंदर होते कि बच्चों की तरह हम हर हाल में खुश रहते। क्यों न बच्चों के रंग में रंग जाएँ, चलो आज हम बड़े भी बच्चे बन जाएँ।
चारों ओर बच्चे हों और माहौल में कोई मज़ा नहीं, यह एक दुर्लभ परिदृश्य है। बच्चे घर की जान होते हैं, उनके मासूम सवाल सबकी बोलती बंद कर देते हैं, वे हर छोटी चीज़ की परवाह करते हैं, एक बहुत छोटी चीज़ उन्हें प्रेरित करती है, और उनका कोमल दिल हर एक के साथ समान व्यवहार करता है। हां, एक बच्चा हमारा गुरु होता है और उन चीजों की याद दिलाता है जो बड़े होने पर धुंधली हो जाती हैं।
इन गुणों ने मुझे विभिन्न पहलुओं पर सोचने पर मजबूर किया जिन्हें हम बड़े जिंदगी की सीख बना सकते हैं।
एक बच्चे की पूरी क्षमता अपरिहार्य है, उनकी मासूम हरकतें हमें कई मौकों पर हैरान कर देती हैं। "थका हुआ" शब्द एक बच्चे के शब्दकोश में शामिल नहीं है। उन टिमटिमाती आँखों में परिवेश का पता लगाने का जुनून किसी भी तुलना से परे है। रॉबर्ट ब्रॉल्ट का कथन बिलकुल सहज है कि, "दुनिया उतनी ही नई है जितनी हमारे जीवन में बच्चे हैं।"
एक बच्चे का दिल किसी और चीज को नहीं जानता और हर एक को एक मजबूत विश्वास के साथ प्यार करता है। बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं यदि वे अपने प्रियजनों से घिरे होते हैं और बिना शर्त भरोसा करते हैं। बच्चों का अटूट भरोसा रिश्ते की नीव को बहुत मज़बूत बनाते हैं।
क्या आपने कभी गौर किया है कि बच्चे अपने दोस्तों के साथ कितना अच्छा व्यवहार करते हैं। और मस्ती के साथ नखरे और झगड़ा उनके खेल का हिस्सा है। ज्यादातर एक बच्चा वही चाहता है जो दूसरे के पास है, या वे एक विशेष सीट के लिए लड़ सकते हैं, लेकिन कुछ ही मिनटों के भीतर वे फिर से खेलना शुरू कर देते हैं जो कि एक बच्चे के जीवन की अद्भुत विशेषता है। आशा है कि हम बड़े भी यह ख़ास गुण अपनाएं और क्षमा कर कुछ ही सेकंड में चीजों को नए सिरे से शुरू करें। मैरिएन विलियमसन ने बहुत उपयुक्त रूप से उद्धृत किया, "बच्चे खुश हैं क्योंकि उनके दिमाग में 'सभी चीजें जो गलत हो सकती हैं' जैसी नाम की कोई फाइल नहीं है।"
बच्चा आकाश में तारों को छूना चाहता है और उसे पकड़ने की कोशिश भी करता है, जैसे-जैसे हम बूढ़े होते हैं कई व्यावहारिक तथ्य हमारी कल्पना को बांधते हैं और हम सीमाओं के भीतर सोचने की कोशिश करते हैं। आइए हम और अधिक रचनात्मक बनें और सीमाओं से खुद को मुक्त कर जीवन को जिएं।
छोटे बच्चे बिना किसी डर के वर्तमान क्षण का आनंद लेते हैं। और हम बड़ों को भी यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हर कोई खुश रहे और हर क्षण का आनंद लें। ज्यादा सोच विचार बहुत सारी बेड़ियां खोल देता है और इन्हीं छोटी छोटी चीजों में हम बड़े कभी कभी यह महत्वपूर्ण बातें भूल जाते हैं।
एक बच्चा चीजों को जटिल नहीं करता है; वे सीधे और दिल से सच्चे होते हैं। उनका सदाचार ही सब कुछ ठीक कर देता है। किसी स्थिति को उलझाने के बजाय हमेशा समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए।
एक बच्चा हमें कई महत्वपूर्ण चीजें सिखा सकता है जिसे हम बड़े होने पर भूल जाते हैं; यह बच्चे ही हैं जो हमें हमारे कर्तव्यों की याद दिलाते हैं और हमें तरोताजा रखते हैं। हम बड़े अपनी युवा ब्रिगेड को कई तरह के जीवन के पाठ पढ़ाते हैं लेकिन बदले में यह नन्हे बच्चे हम बड़ों को बहुत कुछ सिखा जाते हैं। जीवन में कुछ भी सीखने का कोई अंत नहीं है; एक छोटी सी बात हमें जीवन की गहराई सिखा सकती है। एंजेला श्विंड्ट ने बहुत खूबसूरती से उद्धृत किया "जबकि हम अपने बच्चों को जीवन के बारे में सब कुछ सिखाने की कोशिश करते हैं, हमारे बच्चे हमें सिखाते हैं कि जीवन क्या है।"
तो आइए इस बाल दिवस पर, हम फिर से दिल से बच्चे बनें और जीवन का भरपूर आनंद लें।
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काश मैं उस जली हुई दाल को ठीक कर पाती।
काश उस दोस्त का दिल नहीं दुखाया होता।
मुझे इस तरह के बोल नहीं बोलने चाहिए थे।
काश सारी गलतियाँ करी ही न होती।
क्या ऐसे विचार कभी आपके भी मन में उत्पन्न हुए हैं?
यह सामान्य बात है, मनुष्य गलतियों को देख कर उस पर अफ़सोस मनाता है और सोचता है कि काश ऐसा कुछ हुआ ही नहीं होता। अपने दोष को सोच कर बहुत दुःखी होता है और अक्सर सारी घटनाओं को बहुत ही नकारात्मक दृष्टिकोण से देखने लगता है। उसे उसके गलत कार्य का बहुत पछतावा होता है। और अपने जीवन की घडी को पीछे घुमा कर वह उन गलतियों को सही करना चाहता है। मानो की जीवन में डिलीट बटन होता और वह अपनी गलती पूरी तरह मिटा सकता और यह अपेक्षा रखता कि जीवन में खुशहाली छा जाती।
पर क्या ऐसा होना सही होता? क्या आपने इस पर कभी समीक्षा की है?
ज़रा सोचिए अगर आपके जीवन से सारी गलतियाँ हटा दी जाए तो सबकुछ बिल्कुल सही हो जाएगा। जीवन का हर पड़ाव बड़ी सरलता से पार हो जाता, न कोई टोकता और न कोई कुछ कह पाता।
पर क्या ऐसा संभव है ?
फिर क्या आप कह सकते कि आपको जीवन का अनुभव है?
मनुष्य अपनी गलतियों से सीख लेकर ही आगे बढ़ता है और अपने दोष को दूर करता है। परंतु कोई भी गलती करना नहीं चाहता वो बस हो जाती हैं। क्या इसका होना सही है?
गलतियों से हमें जो सीख मिलती है और समझ मिलती है वो हमें कभी प्राप्त ही नहीं होती ना ही जीवन में हमें वो सारे अनुभव होते जो हमें गलतियों से सीखने पर होते है। अगर आप साइकिल चलाना सीखते हैं तो कई बार गिरते भी हैं, तो क्या बिना गिरे आप कोई भी प्रयास पूर्ण कर सकते हैं ? नहीं में उत्तर आएगा, त्रुटियाँ भी उसी प्रकार होती हैं धीरे - धीरे आपको गुणी बनाती है। यही गुण - दोष जीवन को सँवारते हैं और अनुभवी बनाते हैं।
अनुभव के साथ साथ हमें गलतियों से एक और महत्वपूर्ण चीज की प्राप्ति होती है। आप सोच रहे होंगे कि गलतियों से ऐसा क्या मिलता है पर अगर आप जानेंगे तो आप समझेंगे की गलतियां हमें जीवन का वो फ़लसफ़ा दे जाती है जो जीवन के स्वर्ण पदक भी नहीं दे सकते। गलतियां हमें हौसला देती है।
हाँ, जब हम गलती करते हैं तो हम अपने जीवन के सफ़र में कई कदम पीछे हो जाते है, परंतु सफ़र में बने रहने और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम डटे रहते हैं हौसलों के साथ। इस हौसले से हम जीवन की कोई भी मुश्किल को हस्ते-हस्ते पार कर लेते है क्यूँकि इस हौसले से हमें हिम्मत प्राप्त होती है।
हिम्मत अगर बनी रहे तो मनुष्य पहाड़ जैसी कठिनाई को भी पार कर लेता है।
गलतियों से एक और सबक मिलता है, वह है संयम का। जी हाँ! संयम का स्थान जीवन में कई ऊँचा है, इसलिए हमें भी उसका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अगर आप धैर्य यानी संयम से अपने काम करें और वार्तालाप के समय सोच समझ कर बोलें तो आपकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं आएगा। अक्सर मनुष्य शीघ्रता में ऐसे काम कर जाते हैं जो उन्हें बाद में पछतावे की ओर ले जाते हैं। आपकी गलतियों से आपको संयम का पाठ मिलता है, जिसका पालन करने से आप गलती को दोहराते नहीं हैं।
अब आपने जान लिया होगा क्यूँ हर एक बच्चा गिर कर ही चलना सीखता है? क्यूँकि, उसके माता पिता भी जानते है कि गिरकर संभलने से बच्चा अपने आप कई बातें सीख रहा है। तो अगर अब आपसे कभी गलती हो जाए तो पछतावे के साथ यह भी याद रखें कि आपने गलती के साथ एक अनुभव किया, सबक़ लिया और हिम्मत जुटाई फिर से उस काम को पूरी क्षमता से पूर्ण करने की।
गलतियों से सीख तभी मिल सकती है जब हम अपनी गलतियों को स्वीकारें। तो जीवन में डिलीट बटन की प्रतीक्षा ना करें, अपने आप सफलता का रास्ता बनाएँ। गलतियाँ गति रोधक हो सकती हैं पर रास्ते की रुकावट नहीं।
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सकारात्मक विचारों के बुलबुलों को उठने दें, फिर देखें कैसे यह छोटी - छोटी बूंदे हमारी खुशियों का सागर बन जाती है |
हम हमारे जीवन में ऐसी कई चीज़ों को देखते हैं, समझते हैं और यहाँ तक कि हम अपने आस पास के लोगों की कई बातों से प्रभावित भी होते हैं| लेकिन कभी आपने सोचा है कि एक परिस्थिति में दो मनुष्य अलग अलग विचारधारा से क्यों सोचते हैं? और उनके कार्य कभी थोड़े अलग तो कभी बिल्कुल ही विपरीत क्यो होते हैं?
हम हमारे जीवन में जिस प्रकार का स्वभाव रखते हैं या जो एक्शन प्लान सोचते है वो भी हमारे विचारों से ही जुड़ा होता है। ऐसी बहुत चीज़ें हैं जिसपर हमारे विचार निर्भर करते हैं| हमें जीवन मैं किस मोड़ पर मुड़ना है या किस रास्ते पर चलना है इसका मार्गदशक हमारे विचार ही तो हैं |
अगर हम सकारात्मक विचार से दिन की शुरुआत करते है तो दिन भी मंगलमय होता है। सही शुरुआत ही सही रास्ता तय करता है। दिन मुस्कान से शुरू करने से आपके सभी काम भी सफलतापूर्वक होते है और कोई भी कठिनाई आने पर आप घबराते नहीं परंतु बहुत ही सूझबूझ से उसका सामना करते है।
सदैव कार्य शुरू करने से पहले एक लम्बी गहरी सांस लेकर उसे आरम्भ करें, जब हम कार्य को संतुलन से शुरू करते है तो कार्य के सभी पहलू बखूबी पूरे होते हैं। मन में शांति बनाए रखने से आप अपने काम को अपनी पूर्ण क्षमता तथा सूझ बूझ से तय सीमा मैं संपन्न कर लेते हैं |
विचार जिस प्रकार मन में उठते हैं उसी तरह के शब्द दिमाग में चलते हैं और फिर मनुष्य उसी प्रकार की बोली बोलने लगता है। उदाहरण के तौर पर आप बहुत क्रोधित हैं और उसी समय आपसे कोई पता पूछता है तो आप या एक शब्द में उत्तर देंगे या फिर नहीं बताएँगे या तो उस इंसान से झल्लाके बात करेंगे। और दूसरी ओर अगर आप बहुत प्रसन्न हैं तो पूरा पता ठीक से समझाएँगे। ऐसा होना स्वाभाविक है, इसलिए एक विचार मन में रखिए जिससे आप सब से एक जैसी बातचीत कर सकें और किसी बात का आपको बाद में अफसोस ना हो।
आप सोच रहे होंगे कि कौन अपने मन में बुरे या नकारात्मक विचार आने देता है, यह तो दिनचर्या और दूसरों के बर्ताव पर तय होता है कि हम अपने विचार कैसे रखे।
इसका भी एक साधारण और आज़माया हुआ तरीका है जिससे आप कभी भी नकारात्मक विचार को छोड़ सकते है और सुनहरे विचार अपने पास रख सकते है।
अगर सकारात्मक विचार की कुंजी जीवन में मिल जाए तो फिर जीवन सफल और आपके चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती है।
कुंजी भी आपके पास ही है, आपके पास जैसे ही नकारात्मक विचार आए तो सोचिए क्या इससे मेरे जीवन के कुछ साल पर प्रभाव पड़ेगा? क्या आपके आने वाले समय में यह बात इतनी महत्त्वपूर्ण होगी? क्या इस बात से आपके जीवन मैं बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है? अगर "नहीं" में उत्तर आए तो इस विषय पर सोच कर अपने पारे को चढ़ाने से आपको कोई लाभ नहीं होगा। उस बात को वहीं जाने दीजिए। और अगर "हाँ" में उत्तर है तो अपने जीवन साथी, अपने परिवारजन से बात करके हल डूँढे।
यह जरूर याद रखें की हम अपने विचारों पर काबू पाना सीखें और सकारात्मक विचार धारा अपनों के आस पास भी बहने दें। दूसरों के विचारों को हमें नहीं अपनाना, बल्कि गलत विचारधारा को समाप्त करना ही हमारा उत्तम उद्देश्य होना चाहिए। ऐसा पड़ाव जीवन में कई बार आएगा जब आप अपने विचारों से डगमगाने लगेंगे परंतु आपके अच्छे विचार ही आपको वो आत्मविश्वास देंगे और मजबूती से किसी भी तरह की जटिल समस्या का सामना करने की ताकत प्रदान करेंगे।
एक कोशिश इंसान को क्या क्या नहीं सिखा देती तो क्यों ना आज से हम अपने अच्छे विचार ही मन में रखें और फिर देखें की दुनिया कितनी सुंदर दिखाई देती है।
vichaar, सकारात्मक विचार, positive vichaar, विचार - जीवन की नींव