खिड़की के पास बैठी ललिता की आंखों में हल्की सी चमक थी। सामने प्याली में बची आधी चाय से उठती हल्की भाप में जैसे कोई पुरानी याद घुल रही थी। वो चुपचाप उस प्याली को देख मुस्कुरा रही थी, लेकिन उस मुस्कान में गहराई थी, एक बचपन के एहसास की।

दिव्या बिस्किट की ट्रे लेकर आई और माँ की आंखों में डूबी उस चुप्पी को भांपते हुए बोली, “माँ, आज कुछ अजीब सा याद आ रहा है ना?”

ललिता इंकार नहीं कर पाई, आखिर उसके हाथ में आधी प्याली चाय जो बची हुई थी।

"तूने चाय पी ली?"

हाँ माँ, आधी प्याली ही तो थी मेरी, जो जल्दी ही खत्म हो गई, वैसे तो आप भी चाय गर्म ही पीते हो पर आज पता नहीं आपका मन कहाँ लग गया।

ललिता धीरे से मुस्कुराई, "मेरा मन तो आधी प्याली चाय में ही है।"

दिव्या कुछ समझ नहीं पाई और अपनी माँ को प्रश्न भरी आंखों से देखने लगी।

ललिता जानती थी कि अब ये पूरा किस्सा सुनकर ही मनेगी।

“तू सुन… आज एक किस्सा सुनाऊं।”


“मैं तब करीब 10 साल की थी। गर्मियों की छुट्टियाँ थीं और हम सब नानी के घर जमा थे। नानी का घर मतलब हँसी, शोर और ढ़ेर सारी कहानियाँ।

उन्हीं दिनों, हर दूसरे या तीसरे दिन एक ग्वालिन दूध लेकर आती और साथ में पूरे मोहल्ले की खबरें भी साथ लाती। उनका नाम आशा था।

”सभी घर की औरतें भी ऐसे उसका इंतजार करती जैसे कि कुछ नया बता देगी और यही नहीं कभी-कभी कुछ बातों की पुष्टि भी वही करती।"

"ओ …तो वो सरला मौसी की तरह थी…", दिव्या को अपनी माँ को चिढ़ाने में बहुत मज़ा आ रहा था।

"चुपकर…अब सुन", ललिता बिना रुके बात बताने लगी।

“आशा मौसी जब आतीं, तो मासी हमेशा उन्हें चाय के लिए कहतीं। और उनका वही जवाब – ‘अभी नहीं… चलो तुम कह रही हो तो आधी प्याली पी लूंगी।’ जैसे उनके होंठों पर यह लाइन सिली हुई हो।”

“हम बच्चे दरवाज़े के पीछे छिपकर उनकी नकल करते, 'आधी प्याली चाय' और खिलखिलाकर हँसते। लेकिन तब नहीं जानते थे कि इन शब्दों में कितनी गहराई छिपी है।”

माँ…आप भी…

"कहा तो तुम्हे मैं 10 साल की थी जब,

आशा मोहल्ले के किस्से बहुत ही आनंद के साथ बताती थी और जब तक उसकी आधी प्याली चाय बनकर आती थी और जब तक वह चाय पीती थी जब तक सबका मनोरंजन भी हो जाता था। लेकिन यह सब आधी प्याली चाय के चक्कर में था।

जब एक दिन मेरे भैया ने मौसी से पूछ ही लिया, ये आशा मासी आधी प्याली चाय ही क्यों पीती हैं? क्या उन्हें हमारे घर की चाय पसंद नहीं? और हर बार मना करते हुए कहती है अगर बना रहे हो तो ही आधी प्याली पी लूंगी।

मौसी ने जो जवाब दिया, वो उस दिन से मेरे दिल में बस गया।”


ललिता की आँखें नम हो गई।

“मौसी बोलीं, ‘आशा अपने लिए चाय नहीं मांगती, वो कहती है अगर बन रही हो तो दे देना… आधी प्याली। ताकि किसी पर बोझ न बने। उसे पता है उसे और घरों में भी जाना है, वहां भी कोई उसका इंतज़ार कर रहा होगा… वो जानती है, उसकी चाय से ज़्यादा उसकी बातें सबको जगा देती हैं।'”

एक गहरा सन्नाटा ललिता की बातों के साथ कमरे में छा गया।

“तो बेटा… ये जो आधी प्याली चाय है न, वो आदत नहीं है… वो अपनापन है, सम्मान है, रिश्तों को हल्के से जीने की कला है। किसी की जगह लिए बिना, फिर भी दिलों में बस जाने की खूबसूरत अदा है।”


दिव्या की आंखें भी नम हो गईं। वो मुस्कुराई, “माँ, आपकी चाय तो ठंडी हो गई… चलिए, मैं फिर से बना लाती हूँ … इस बार आधी-आधी प्याली… आशा मौसी के नाम।”

ललिता ने हौले से सिर हिलाया, “हाँ, और मीठी थोड़ी कम रखना… जैसे आशा मौसी पीती थीं।”

ललिता मुस्कुरा दी, जैसे यादों की वो आधी प्याली फिर से भर गई हो। दिव्या रसोई की ओर चाय बनाने चली गई और घर में फिर से अदरक की खुशबू घुलने लगी।

इतने में ललिता ने अपनी दीदी को संदेश भेजा, "दीदी, आशा मौसी कैसी हैं? आज बहुत याद आईं…कभी बात नहीं हुई, उनका हाल बताना…" और मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें टिक गईं।

चाय बनकर आई, दो छोटी प्यालियों में आधी भरी हुई, एक ललिता के हाथ में और दूसरी दिव्या के। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में मुस्कुराते हुए चाय की चुस्की ली और फिर वही पुरानी नकल, "चाय… अभी तो नहीं, चलो तुम कह रही हो तो आधी प्याली पी लूंगी…" और दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

इस अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस, एक प्याली चाय अपनों के साथ ज़रूर बाँटिये, फिर चाहे वो आधी ही क्यों न हो। क्योंकि कभी-कभी रिश्तों की गर्माहट, एक प्याली चाय में ही बस जाती है। कभी-कभी आधी प्याली चाय, किसी रिश्ते का पूरा एहसास दे जाती है… और बहुत कुछ सिखा जाती है।

सुबह की सुहावनी धूप में कीर्ति चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। यह समय उसके लिए बहुमूल्य था, वकालत की दौड़-भाग को भूल कुछ क्षण अपने लिए चुरा लिया करती थी।

कीर्ति को विष्णु की गुहार सुनाई दी। “आज नंदा का बेटा इस समय यहाँ कैसे?”, चाय का प्याला हाथ में लिए आँगन की और अपने कदम जल्दी जल्दी बढ़ाने लगी। कीर्ति के आँगन की ओर बढ़ते कदमों को रश्मी ने अचानक रोका, "माँ, आज यह कुर्ता जरूर ऑर्डर कर देना, आज सेल का आखिरी दिन है। मुझे कॉलेज जाने के लिए देरी हो रही है, मैं चलती हूँ"। "रश्मी की फरमाइशें कब खत्म होंगी?", सोचते हुए कीर्ति आंगन में पहुँची।

नंदा उसके यहाँ काम करती थी, समय की पाबंद, सफ़ाई में अव्वल, यही खूबियों वाली सहायक चाहिए थी कीर्ति को। ६ साल का विष्णु काँपते स्वर में रट लगाकर अपनी माँ से ज़िद कर रहा था, "अम्मा, मैं आज स्कूल जाऊँगा, वहाँ आज मटर पुलाव मिलेगा"। “क्यों नहीं, मैं स्वयं तुम्हें छोड़ आऊँगी, तुम्हारा स्कूल नहीं छूटेगा", भारी मन से नंदा ने उत्तर दिया।

"नंदा, लगता है तुम्हारे बेटे को पढ़ाई में बहुत रुचि है", कीर्ति ने मुस्कुराते हुए कहा। उसने विष्णु को जैसे ही थपथपाया, वह समझ गयी यह तपन गर्मी की नहीं, बुख़ार की है। “विष्णु की तबीयत ठीक नहीं है, इसे तो तेज बुख़ार है", कीर्ति ने नंदा और विष्णु को घर के भीतर आने को कहा।

नंदा तुरंत विष्णु को गोद में लेकर भीतर आ गयी। कीर्ति ने जल्द ही गरम दूध और नाश्ते की प्लेट नंदा को थमाई और दवाई ढूँढ़ने लगी, “विष्णु को इतना तेज बुख़ार है और तुम उसे स्कूल भेजना चाहती हो ?“

विष्णु ने पराठे को २ भागों में बाँटा और अपनी माँ के साथ नाश्ता करने में मग्न हो गया। ५-६ निवालों के बाद नंदा की आँखों से आँसू छलकने लगे और बड़े ही भारी मन से कीर्ति की ओर देखा। कीर्ति समझ गयी की बात गम्भीर है, उसने विष्णु को दवाई पिलायी और सोफ़े पर लेटा दिया और खुद नंदा के पास जा बैठी।

नंदा ने रोते हुए बताया, "परसों मेरा पति मुझ बेड़ौल को छोड़, २० वर्षीय सुंदर लड़की के साथ सारे रुपए लेकर भाग गया, घर में २ दिन से खाना नहीं बना है। विष्णु स्कूल जाकर ही अपना पेट भरता है"।

बिना कुछ आगे पूछे कीर्ति ने नंदा को २००० का नोट थमा दिया, "तुम चिंता मत करो, विष्णु का ध्यान रखो"।

कीर्ति को समझ नहीं आया आख़िर किसकी भूख सबसे बड़ी है? "क्या मेरी समय की भूख़, या रश्मि की इच्छाओं की भूख या फिर उस नन्हे विष्णु के पेट की भूख, या नंदा के पति की पैसों की भूख"।

कीर्ति अपने चाय के आधे भरे प्याले को एक तरफ रख, कोर्ट के लिए रवाना हो गई।

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