पिता — एक ऐसा शब्द जिसमें पूरे जीवन की मजबूत नींव समाई होती है। उनके साये में हम ना जाने कब बड़े हो जाते हैं, लेकिन उनके छोटे-छोटे संकेत, उनकी आदतें, और उनकी निशानियाँ जीवन भर हमारे साथ रहती हैं। ऐसी ही एक निशानी है — बाबा का गमछा।
आज, फादर्स डे पर, उन्हीं अनकहे जज़्बातों और स्मृतियों को समर्पित ये पंक्तियाँ…
बचपन की धूप में, छाँव बन के आया,
बाबा का गमछा, मेरे सिर पे छाया।
न धूप जली, न बारिश ने भिगोया,
उस गमछे ने हर तूफ़ान से रोका।
मैले से कपड़े, पर पवित्र थी छुअन,
उसमें लिपटा था बाबा का अपनापन।
कभी काँधे पे डाला, कभी हवा में लहराया,
जब डर लगा, उसी में चेहरा छुपाया।
रोटी के साथ मेहनत परोसी,
थके हाथों से हर उम्मीद सींची।
सपनों की बुनाई वो चुपचाप करता,
ग़मछा पोंछता पसीना, पर न शिकवा करता।
जब स्कूल में गिरा, वो गमछा उठा,
"चल बेटा, तू गिरा नहीं, बस थोड़ा लुढ़का।"
वो शब्द आज भी सीने में जलते हैं,
बाबा के ग़मछे से बंधे हौंसले पलते हैं।
अब जब भी राहें कठिन सी लगतीं,
गमछा पकड़कर हिम्मत सी जगती।
कभी माथे का पसीना, कभी आँखों का आँसू,
हर मोड़ पे बना वो मेरे साथ का जादू।
बचपन से लेकर जवानी की राहों में,
हर मोड़ पर खड़ा था वो विश्वास की बाँहों में।
आज भी जब दुनिया बड़ी लगती है संग्राम-सी,
बाबा का गमछा है — मेरी सबसे बड़ी आराम-सी।
बचपन से लेकर आज तक, गमछा नहीं सिर्फ़ कपड़ा, बाबा की सीख है — मेरी ताक़त का स्तंभ।
फादर्स डे पर यह एहसास और भी गहरा हो जाता है कि हमारे पिता ने हर संघर्ष में हमारा हाथ थामे रखा — कभी शब्दों से, तो कभी अपने गमछे जैसे साये से। उनकी दी हुई यही विरासत हमें हर परिस्थिति में संभलना सिखाती है। आइए, आज उनके इस अमूल्य साथ को दिल से नमन करें।
समय को बाँधता मैं हूँ,
अहंकार का नाश मैं हूँ,
सृष्टि की रचना मैं हूँ,
जीवन का संचार मैं हूँ।
काल का काल मैं हूँ,
शून्य का सार मैं हूँ,
निराकार मैं हूँ,
अनंत में मैं हूँ।
तुम्हारे अंतर्मन में मैं हूँ,
तुम्हारे हर प्रयत्नों में मैं हूँ,
हां, मैं शिव हूँ,
मुझे ढूंढो, मुझे समझो,
मैं ही तुम हूँ, तुम ही मैं हूँ।
हाँ, मैं शिव हूँ।
हाँ, यह सत्य तो है कि हम शिव को अनेकों जगह ढूँढ़ते हैं, परन्तु शिव हम में हैं, शिव अनन्त हैं। शिव को समझना जितना मुश्किल है उतना ही आसान भी। शिव की आस्था में जितने दिन लीन हो उतना ही कम है पर महाशिवरात्रि पर भक्तों का समर्पण अपने चरम सीमा पर होता है।
शिवरात्रि एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है जो हमारी आत्मशुद्धि के लिए अति आवश्यक है। शिव जी की साधना और पूजा अर्चना, उपवास व ध्यान की भिन्न भिन्न प्रक्रिया न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह मानसिक और आत्मिक शांति प्राप्त करने का एक तरीका भी है।
इस पावन अवसर पर, हम अपनी नकारात्मक सोच और कुछ आदतों का त्याग कर, अपनी क्षमताओं को पहचान कर, जीवन में सुख और समृद्धि पा सकते हैं।
आइए जानें : शिव कौन हैं? शिव का अर्थ क्या है?
शिव जितने भिन्न हैं उतने ही प्रकृति में समाए हुए हैं, आइए समझते हैं कि शिव और प्रकृति का क्या सम्बन्ध है।
पृथ्वी संतरणात् संतु नः पुन्या पुन्येन वातः।
पुन्येन अध्युष्ट पुन्या पृथ्वी पुन्येन संतु नः॥
हमें अपने पुण्य कार्यों से पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए जो हमारी अपनी भलाई और आने वाली पीढ़ियों की भलाई के लिए पृथ्वी, जल और वायु के संरक्षण के लिए आवश्यक है।
हमारे जीवन में प्रकृति का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जंगल, पहाड़, नदियां, और आकाश प्रकृति के ये तत्व हमें शांति, संतुलन और ऊर्जा प्रदान करते हैं। लेकिन, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में हम प्रकृति से दूर हो गए हैं। हम अपनी आँखों को कंक्रीट के जंगलों में और मस्तिष्क को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उलझा लेते हैं।
महाशिवरात्रि पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति से जुड़ें और अपने समय का कुछ हिस्सा प्रकृति के बीच बिताएं, ताजगी महसूस करें और अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए प्राकृतिक ऊर्जा को स्वीकार करें। प्रकृति की अनगिनत रचनाओं से सीखें और उसे बचाने के लिए पृथक प्रयास करें। इससे हमारे शरीर और मन को शांति प्राप्त होगी।
उदेति सविता ताम्र, ताम्र एवास्तऐति च। सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥
जैसे सूर्य का रंग उदय या अस्त होते समय एक समान होता है ठीक वैसे ही हमारा व्यवहार भी सभी परिस्थितियों में समान होना चाहिए।
विचलित मन, जो हर समय अव्यवस्थित रहता है, हमारी मानसिक शांति को भंग करता है। यह एक वास्तविकता की तस्वीर है जिससे हम सब बड़ी आसानी से मुँह मोड़ लेते हैं। हमारी चिंताएँ, विचारों का असंतुलन और बिना उद्देश्य के भटकने वाली मानसिकता हमें आत्मज्ञान और ध्यान से दूर कर देती है।
शिवरात्रि पर ध्यान और साधना से मन को शांत रखना जरूरी है। इस दिन हमें अपने मन को शांत और स्थिर रखने का अभ्यास करना चाहिए। एक व्यवस्थित मन सही निर्णयों को लेने में सक्षम होता है इसीलिए हमें अपने विचारों को नियंत्रण में लाने और चित्त को शांत करने की कोशिश करनी चाहिए।
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नवाच्यं विद्यते क्वचित्॥
मनुष्य जब क्रोध में होता है तो उसको क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं बोलना चाहिए इसका विवेक नहीं रहता।
क्रोध एक ऐसी नकारात्मक भावना है जो न केवल हमारे शरीर और मस्तिष्क को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि हमारे रिश्तों को भी तोड़ देती है। जब हम क्रोधित होते हैं, तो हम अपने विवेक और समझ खो देते हैं और ऐसा कुछ कर जाते हैं जिसका पछतावा हमें जीवन भर होता है। इसका एक ही उपाय है, क्रोध से दूरी बनाये रखना। क्रोध को त्यागना एक बड़ी चुनौती हो सकती है, लेकिन शिवरात्रि का यह अवसर हमें इसे नियंत्रण में रखने का आदर्श अवसर देता है।
हमारे भीतर क्रोध को कम करने के लिए, हमें खुद से और दूसरों से क्षमा मांगने की आवश्यकता है। इस दिन को अपने क्रोध को छोड़ने और आत्मा में शांति के लिए ध्यान करने का दिन बनाएं। शिव के ध्यान से यह संभव हो सकता है कि हम अपने भीतर की घृणा, कष्ट और गुस्से को सुलझा सकें।
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतो:
सभी दिशाओं से नेक विचार ही मेरे पास आएं
नकारात्मक सोच हमें हर अच्छे अवसर से दूर कर देती है। आप सोच रहे होंगे यह तो कोई नयी बात नहीं है परन्तु, यह साधारण सा बदलाव ही सारे गुणों से सर्वोपरि है। नकारात्मक सोच ही हमारी आत्म-संवेदनशीलता को प्रभावित करती है और हम अपने जीवन के अच्छे पहलुओं को नजरअंदाज कर देते हैं। शिवरात्रि का दिन इस नकारात्मक सोच को छोड़ने का सर्वोत्तम समय है।
हमें अपनी मानसिकता में सकारात्मकता लानी चाहिए और यह समझना चाहिए कि भगवान शिव हमें सही रास्ते पर चलने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। हमें हर कठिनाई को एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। शिवरात्रि पर हम अपने विचारों को सकारात्मक दिशा में बदलने के लिए कदम बढ़ा सकते हैं।
नास्त्यहंकार समः शत्रुः
अहंकार के समान कोई शत्रु नहीं है। अहंकार व्यक्ति को आत्मसमर्पण और स्वीकृति के मार्ग से हटा देता है और उसे अपनी गलतियों को मानने में विफल करता है।
आडंबर और अहंकार व्यक्ति को आत्मसाक्षात्कार से दूर ले जाते हैं। शिवरात्रि का यह पवित्र दिन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति न तो किसी दिखावे और न ही अहंकार से संबंधित होती है। भगवान शिव के प्रति वास्तविक श्रद्धा और प्रेम में कोई आडंबर नहीं होता।
इस दिन हमें अपने अहंकार और दिखावे को छोड़ना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि जो दिखावा हम दूसरों के सामने करते हैं, वह हमें आंतरिक शांति से दूर करता है। शिवरात्रि का दिन हमें अपनी आत्मा को शुद्ध करने का समय प्रदान करता है।
शिवरात्रि पर इन पांच दोषों का त्याग और उनके हल को अपनाने से हम अपने मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं, और यह हमारे जीवन को एक नई दिशा भी दे सकते हैं। जब हम अपनी गलत आदतों और नकारात्मकता से मुक्ति प्राप्त करते हैं, तो हम आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलने में सक्षम होते हैं। शिवरात्रि का यह पर्व हमें अपनी गलतियों को सुधारने और अपने जीवन को शुद्ध करने का अद्भुत अवसर प्रदान करता है।
आइए, हम सब मिलकर इस शिवरात्रि को अपनी आत्मा की शुद्धि और मानसिक शांति के लिए समर्पित करें।
बसंत पंचमी का त्यौहार भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व सर्दी के मौसम के समाप्त होने और गर्मी की शुरुआत का प्रतीक है। साथ ही, यह ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के पूजा का दिन भी है। बसंत पंचमी का महत्व केवल मौसम बदलने के रूप में नहीं है, बल्कि यह एक संस्कृति, आस्था और विश्वास का पर्व भी है।
बसंत पंचमी की सुबह का दृश्य बहुत ही अद्भुत होता है। जब सूरज की किरणें धरती पर पड़ती हैं, तो चारों ओर पीले फूलों से रंगी हुई धरती एक नया रूप धारण करती है। पीला रंग बसंत का प्रतीक है, जो शुभता और समृद्धि का संकेत देता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं और अपने घरों को सजाते हैं। पीले रंग के कपड़े पहनना खास तौर पर शुभ माना जाता है।
आइये बसंत पंचमी पर कविता द्वारा जानें सरस्वती माता का आगमन कैसा होता है और वे हमें क्या सिखाती हैं।
बसंत पंचमी का पर्व आया, हर दिशा हुई पीतवर्ण।
धरती ने ओढ़ी छटा स्वर्णिम, गूंज उठा प्रकृति का कण कण।
अम्बर में खिली धूप, और हवा में घुली मिठास,
ज्ञान और वाणी देवी माँ सरस्वती, का आगमन बना खास।
माँ सरस्वती की कृपा से हर मन में जगे ज्ञान की ज्वाला,
शब्दों में समाहित हर समस्या का हल और सफलता का प्याला।
मधुर वाणी से ही जीवन में निखार आता,
बसंत पंचमी का यह पर्व यही है सिखाता।
शिक्षा का प्रकाश जब हमारे हृदय में है समाता,
हर विचार और हर शब्द एक नया आयाम पाता।
ज्ञान की ज्योति बन मार्ग दिखाए, हर अंधकार मिटाती,
संस्कार, विवेक, और चेतना की नई किरण जगाती।
शब्दों में शक्ति है, जो जीवन को दिशा दे,
वाणी में है ताकत, जो अंधकार को धूमिल करे|
वाणी की ताकत से जब हम सत्य बोलते हैं,
तो आत्मविश्वास से अपने सपनों को पूरा करते हैं।
आओ, इस बसंत में हम सभी मिलकर वाणीवाग्देवी को नमन करें,
शिक्षा के दीपों से हम हर दिल को रोशन करें।
ज्ञान की गंगा से हम सभी की प्यास बुझाएं,
और वाणी शक्ति से समाज में एक नया अध्याय प्रारंभ करें।
इस दिन को लेकर गाँवों और शहरों में उत्सव का माहौल होता है। लोग एक दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं, घर-घर मिष्ठान्न बनते हैं और सभी मिलकर खुशियाँ मनाते हैं। बच्चों को इस दिन खासकर अपने ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। माँ सरस्वती की पूजा होती है और उन्हें संगीत, कला और साहित्य का आशीर्वाद दिया जाता है।
बसंत पंचमी का विशेष संबंध विद्या से भी है। इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से विद्यार्थी अपनी पढ़ाई में उन्नति प्राप्त करते हैं। उन्हें ज्ञान की देवी का आशीर्वाद मिलता है और उनके मनोबल में वृद्धि होती है। विद्यार्थियों के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वे अपनी किताबों और पेंसिलों को इस दिन पूजा करते हैं, ताकि उनकी पढ़ाई में सफलता मिले।
सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥
देवी सरस्वती को नमन, जो वरदान देने वाली और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हैं।
हे देवी, जब मैं अपनी शिक्षा प्रारंभ करूं, तो कृपया मुझे सदा सही समझ की क्षमता प्रदान करें।
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यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत खास है। यह सब कुछ बताता है कि इस दिन का महत्व केवल एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन के नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक है। बसंत पंचमी का पर्व सर्दी से गर्मी के बीच का एक सुंदर संक्रमण है, जो हमें न केवल मौसम के बदलाव का अहसास कराता है, बल्कि जीवन में नए रंग और खुशियाँ लाने का संदेश भी देता है।
विद्या कला और वाणी की देवी मां सरस्वती अपनी वीणा से मानो सृष्टि में प्राण का संचार करती है जिससे कण कण में नई ऊर्जा आ जाती है। देवी सरस्वती के हाथों में धारण वीणा कला का प्रतीक है जो हमें सिखाती है कि जीवन में कला का होना उतना ही आवश्यक है जितना पुस्तक से ज्ञान।
आज आज़ादी के उत्सव पर मन प्रश्नों में डूबा था। जहां एक ओर हम डिजिटल इंडिया और आर्थिक स्थिरता की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं पर हो रहे अत्याचार और अपमानजनक व्यवहार उनके जीवन को संकट में डाल रहे हैं। देश की प्रगति में नारी का भी उतना ही हाथ है जितना पुरुष का। नारी का सम्मान और समानता उनका अधिकार है। देश में एक बदलाव की जरूरत है, हमारी मानसिकता और दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव की।
हम सभी को ऐसे बदलाव की आशा करनी चाहिए जो एक व्यक्ति को वास्तविक मानव बनाए। हम सभी को न केवल ऐसे अमानवीय कृत्य होने पर बदलाव के लिए दहाड़ने की जरूरत है, बल्कि बदलाव की दिशा में लगातार काम करने की भी जरूरत है। जब ऐसे अमानवीय कृत्य होते हैं तो हम सभी को सकारात्मक बदलाव के लिए कार्रवाई करने के लिए अनुस्मारक की आवश्यकता क्यों होती है, और फिर जब तक ऐसे कृत्य दोबारा नहीं होते तब तक पूरी तरह से चुप्पी साध ली जाती है।
यह नीचे दी गई हिंदी कविता हमें अशोभनीय कृत्यों के बाद चुप्पी होने पर भी न्याय के लिए दहाड़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।
आज जिस बात पर इतना शोर है,
कल यहीं पर सन्नाटा होगा |
आज प्रश्न हुए हैं उजागर कई,
जवाब कब मिलेगा यह पता नहीं |
हाहाकार मचा चारों ओर आज,
कल यहीं ख़ामोशी का बजेगा साज़ |
फिर सन्नाटा छा जायेगा सभी पर,
जब तक एक चीख़ उठे नहीं किसी कोने में |
मानवता का अंत तो , हो गया इस कलयुग में,
क्या दैत्य अब पहनेंगे इंसान का चोला खुले में?
क्यों इंसानियत नहीं जागती सन्नाटे में,
किस ओर चला मानव और किस मुखौटे में |
हर इंसान अपने अंतरमन से पूछे,
क्या ऐसे भविष्य में हमें जीना हैं ?
जहाँ चीख़ को भी चुप करा देना
बस एक तमाशा है |
कल फिर सन्नाटा होगा हर जगह शांति छाएगी,
इस समय जाग जाये इंसानियत तो होगी भलाई |
मानवता के बीज को सब में पिरोना है,
दैत्य को पहचान उसे सबक सिखाना है |
इस शोर को शांत न होने दो मन में,
डटे रहो बदलाव की सहर में |
नारी को भगवान की पदवी की नहीं अपेक्षा,
बस इंसानियत और आदर की आकांक्षा |
मानव ! अपनी स्मर्ण बुद्धि सदा सचेत रख,
परिवर्तन की ओर कदम बढ़ा सम्मान की है ललक |
उपेक्षा ना कर नारी का इस युग में,
उठ जाएगी प्रलय की लहर हर कोने में |
यदि हम सभी सकारात्मक मानसिकता के लिए सामूहिक रूप से बदलाव की दिशा में काम करें और लिंग की पूर्व धारणाओं को तोड़ें तो दुनिया रहने के लिए एक खूबसूरत जगह होगी। प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करने वाले बच्चों का पालन-पोषण करना प्रत्येक माता-पिता की जिम्मेदारी है। बेहतर कल के लिए हम सभी को हुंकार भरते हुए वर्तमान में भी मेहनत करनी होगी और इंसान की सोच को भी बदलाव के साथ सकारात्मकता की ओर ले जाना होगा।
प्रकृति को किसी एक तरह से परिभाषित नहीं किया जा सकता। पानी की गहराई और ऊंचाई, पशु-पक्षियों में विचित्रता, गन्ने में मिठास और नीम में कड़वापन यह सबकुछ प्रकृति के द्वारा दिए गए स्वभाव हैं। प्रकृति की भिन्न भिन्न रचनाओं को अगर हम प्रेरणा के स्त्रोत बना ले तो हमें अपने सारे प्रश्नों के हल मिल जाएंगे।
चला खोजने प्रेरणा के स्त्रोत,
सर्व प्रथम हिमालय की ओर।
उंचे शिखर ने दृढ़ता सिखलाई,
याद सदा रखना अपनी जड़ें, बोली खाई।
बहती नदी कहती रुक ना तू जीवन में कभी,
बना अपना रास्ता और आत्मविश्वास से चल तू वहीं।
तट पर टकराती लहरें करती शोर,
अपने सपनों की हो चली है भोर।
निःस्वार्थ भाव सिखलाते विशाल पेड़,
देखो कैसे अपना रास्ता खुद खोजती नाज़ुक बेल।
पुष्प से सीखा मुस्कान फैलाना,
कांटों ने समझाया जीवन जीने का ख़जाना।
चाँद से सीखा शीतल रहना,
सूर्या कहे तुम बनो सबका गहना।
जहां बादल खोले अंगिनत कल्पनाएं,
चमकते तारे सिखाए नवीन क्षमाताएं।
प्रकृति की परिभाषा है अदभुत,
जीवन चक्र के उदाहरणों से तृप्त,
प्रेरणा के अनगिनत स्त्रोत प्रकृति है समेटे,
ध्यान से देखो तो प्रश्नों के हर हल बूझे।
हमारी कविताओं के संग्रह पर एक नजर जरूर डालें।
क्या आपको भी हमारी तरह हिंदी में लिखना पसंद है? तो आप हमें अपनी रचनाएं भेजें और हम अपने ब्लॉग पर आपकी स्वरचित रचनाओं को प्रकाशित करेंगे। अधिक जानकारी के लिए आप यहाँ पढ़ें।
सारे खेल आज ख़त्म हुए,
जा बैठा राजू टक टकी लगाए,
गली के किनारे, अपने बाबा के,
इंतजार में दूर दूर तक निगाहें टिकाए।
बाबा के इंतज़ार में अब भूख़ का है ज़ोर।
क्या हो जाएगी आज फिर बिन मिले ही भोर।
क्या माँ से पूछूँ या करूँ थोड़ा और इंतज़ार?
नन्हे मन में आज उमड़े प्रश्नों के गुबार।
विचलित मन को आई राहत,
जब सुनी बाबा के पैरों की आहट।
देख झोली बाबा के हाथों में,
ख़ुशियाँ जैसे भर गई मासूम आँखों में।
झटपट राजू लिपट बाबा से माँ को आवाज़ लगाई,
आज क्या होगा झोली में सोच सोच मुस्काए।
माँ जल्दी से आज पका दे निकाल झोली से सब्जी,
तब तक सुन लूं मैं बाबा से कहानियाँ अनोखी।
आज निराशा की कहानी पढ़ आया हूँ,
तुझे कहाँ से मैं कोई आशा दूँ।
बेटा आज नहीं चुन पाया उन ढेरों से तेरे सपने,
बस लौटा हूँ बड़े ही हताश मन से।
नहीं कर पाया आज इकठ्ठा तेरे लिए चीज़ें,
झोली आज सुनी है मेरी जैसे मेरे हौंसले,
नाकामी का चिट्ठा सुन राजू को याद आया एक किस्सा,
बाबा का ही मंत्र आज उसने मासूमियत से परोसा।
बाबा झोली तो अपनी मेहनत और उम्मीद से सदा भरी,
फिर तू क्यों कहता ये झोली तेरी खाली पड़ी?
कल का सूरज देखना बाबा नई उम्मीद लाएगा,
जीवन हर दिन एक जैसा परीक्षा पत्र नहीं दे पाएगा।
चुन लेंगे बाबा कल फिर से स्वप्न उन अंबारों से,
सीखा है हौसलों को बांधना उन बिखरे हुए टुकड़ों से,
सुन राजू की बात आज एक बाप हुआ गर्वित,
जीवन की अस्थिरता से अब कोई नहीं चिंतित।
यह तो सबको पता है कि समय एक सा नहीं होता। जहां आंसू हैं वहां हंसी की फुहारें भी हैं। जहां रात की चादर हमें ढक देती है वहीं दिन फिर से आपको अपने पंख फैलाने और उड़ने की उम्मीद देता है। एक नए जोश और नए उत्साह से अपने कार्य को संपूर्ण करने की उम्मीद बांधता है। यह दृढ़ हौसला ही तो हमें अपने सपनों से मिलवाते हैं और बिना विचलित हुए परस्पर आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं।
इसी सोच और दृष्टिकोण के साथ आइए हम नए साल का स्वागत करें।नए साल में नई उम्मीद से आगे बढ़े, न्यूनतम शुरूवात करें उन चीजों की, जो सकारात्मकता को बनाए रखे।
प्रकाशित करें हमारे ब्लॉग पर आपकी अपनी रचनाएँ!!!
धूपछांव विचारों का मंच: स्वरचित रचनाओं को दीजिए आपका अपना मंच
विचारों के मंच में आप सभी का स्वागत है!! आपको बता दें कि यह मंच हमारी एक पहल है हिंदी भाषा के अनूठे स्वरुप को समक्ष लाने की। और इसीलिए अगर आप हिंदी लेखन में रूचि रखते हैं तो हमें आपकी स्वरचित रचनाएं जरूर भेजें और हम आपकी रचनाओं को हमारे ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे। अधिक जानकारी के लिए आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
आज विचारों के मंच पर पहली कविता प्रकाशित हुई है और हर्ष की बात यह है कि यह हमारे पिता द्वारा लिखी गयी है।
आज दफ्तर जाते हुए मैंने देखा कि कुछ प्लास्टर ऑफ़ पेरिस, लकड़ियों और लोहे के टुकड़ों और न जाने कितने तरह तरह के ढ़ेर रास्ते में लगे हुए हैं। तितर बितर यह ढ़ेर हर आने जाने वालों की आँखों में खटक रहे थे। आते जाते यह ढ़ेर जिनके रास्ते में बाधा बनते वह उसे पैरों से इधर उधर धकेल देता। जैसे जैसे दिन बीतते गए वैसे वैसे यह वस्तुएं एक आकार लेती गयी, इन दिनों के विचारों को एक कविता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।
लकड़ी के चंद टुकड़े, लोहे की टेडी मेडी सलाखें,
कुछ पतली कुछ मोटी,
कीलों व पुराने जूट के अम्बार,
प्लास्टर ऑफ पेरिस के बोरे।
तितर बितर बिखरे हुए, दुनिया वालो को टापते
हवा के हलके झोके से विचलित होने वाले।
इन ढ़ेरों को
कौन नमस्कार करेगा?
गर रास्ते में मिल जाये,
तो ठोकर मार अलग करेगा।
इनकी शक्ति को
किसी ने न पहचाना,
सिर्फ कूड़ो का ढेर ही जाना।
लेकिन, सब ढ़ेर मिल कर कह रहे हैं -
हे मूर्ख इंसान !!
आज तू जिसे ठोकर मार रहा है,
अपने से अलग कर रहा है,
कल उसी को प्रणाम करेगा,
अपने गुनाहों को उनके सामने कबूल करेगा।
हमारे अंदर भगवान विराजते हैं,
हम में भगवान बनने की शक्ति है,
क्यूंकि हम उसीसे पैदा हुए हैं,
हम उसी का अंश हैं।
ए विचलित मनुष्य !
भटकाव में डोलने वाले
तुझे मालूम नहीं,
तू भी उसी का अंश हैं।
मानव बहुत ज़ोर से हँसा,
और उपेक्षा से आगे निकल गया।
उन सभी ढ़ेरों ने,
मानव को भगवान से
साक्षात्कार कराने की ठानी।
वो बिख़रे हुए,
तरह तरह के ढ़ेर
आपस में एक तरतीब से मिल गए
एवं भगवान की मूर्ती बन बैठे।
रंगो ने मूर्ति को सँवारा,
चारों तरफ उसके
चमत्कारों का बोल बाला;
धूप दीप बाजे व ढ़ोल नगाड़ा।
मानव दौड़ा दौड़ा आया,
हाथ में कुछ फूल व प्रसाद लाया।
दोनों हाथ जोड़े,
मस्तक नीचे किए,
सुखी भविष्य मांगने लगा,
अपने पापों को क्षमा करने की,
भीख मांगने लगा ।
मूर्ती के अंग अंग से
एक आवाज़ आई,
ऐ ! मूर्ख मानव,
तू हमसे क्या मांग रहा है?
हम तो वही
लोहे, लकड़ी चिथड़ोें के ढ़ेर हैं,
हम सिर्फ आपस में
एक तरतीब से मिल गए हैं,
तथा, एक शक्ति बन बैठे हैं।
जहाँ शक्ति होती है
उसे सभी नमस्कार करते हैं,
जो तरतीब से है
प्रकृति के नियमों के अनुरूप है
वही भगवान है।
हे! मानव इसी प्रकार,
तू भी भगवन का अंश है
बस, अपने अंतरमन के तारतम्य को
थोड़ा व्यवस्थित कर लो,
बुद्धि, वाणी एवं
दृष्टि में सामंजस्य पैदा कर लो।
तुम में भी शक्ति आजाएगी,
अपने आप से जानकारी हो जाएगी,
भगवान से मुलाकात हो जाएगी,
यह जान जाओगे कि
भगवन और कहीं नहीं
तुम्हारे अंतरमन में ही है,
कण कण में है,
सर्वव्याप्त है ।
---- दीन दयाल माथुर
लेखक परिचय:

दीन दयाल माथुर रिटायर्ड चीफ कंट्रोल ऑफिसर हैं जिन्हें रचनात्मकता सदा मोहित करती है। आप एक उत्सुक पर्यवेक्षक हैं और सदा छोटी छोटी चीजों में खुश रहने की विचारधारा रखते हैं।आपके कई लेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। किताबें पढ़ना और परिदृश्य चित्रकारी करने में आपकी खास रुचि है।
आत्मविश्वास
के बादलों पर सवार,
अपनी उम्मीदों से,
आज मैंने दोस्ती कर ली।
आशावादी मन
पंछी बन भरे उड़ान,
अपने सपनों से,
आज मैंने दोस्ती कर ली।
कठिन पथ
विश्वास की बूंदों से तृप्त,
अपनी क्षमताओं से.
आज मैंने दोस्ती कर ली।
कड़ी मेहनत
की अग्नि में तप कर,
अंतर्मन की गूंज से,
आज मैंने दोस्ती कर ली।
शब्दों के सीप
गहराइयों से समेट कर,
लेखन की शक्ति से,
आज मैंने दोस्ती कर ली।
स्वयं को ख़ोज
जीवन के चक्र को समझ,
अपने अनुभवों से,
आज मैंने दोस्ती कर ली।
निष्ठापूर्ण सोच
सकारात्मक विचारों को सींच,
अपने सुनहरे भविष्य से,
आज मैंने दोस्ती कर ली।
दोस्ती एक बहुत ही सुखद रिश्ता है जिससे आप निखर जाते हैं। परन्तु दूसरों के लिए आप अच्छे और सच्चे मित्र तभी बन पाते हैं जब आप खुद को और अपनी प्राथमिकताओं को अच्छे से समझ पाते हैं।
यह स्वार्थी होने की ओर नहीं बल्कि आपको अपने आप से जोड़ने की कला है। जीवन में आप सफलता और सरलता का दामन समेटे कई रास्ते नाप सकते हैं।
तो पहले खुद को अपने आप का अच्छा दोस्त बनाएँ और तभी दोस्ती के सही मायने आपको दूसरों के लिए समझ आएँगे। स्वयं को ख़ोज कर, निस्वार्थ भाव से अपना कर आप अपने अंतर्मन की गूँज के परम मित्र कहलाएँगे।
तो चलिए इस मित्रता दिवस पर एक नए दृषिकोण से आप सब पहले अपने आप को "मित्रता दिवस की शुभकामनाओं" से अलंकृत करें।
क्या आप हमारे इस विचार से सहमत हैं? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएँ।
एक कविता न जाने क्या कुछ कह जाती है। क्या आप भी मानते हैं काव्य रस की शक्ति को? अगर हाँ तो आपको हमारी कविताओं का संग्रह जरूर रोचक लगेगा।
आपने कई बार अनुभव किया होगा एक ऐसी शक्ति जो जाने कहाँ से आप में नई ऊर्जा भर देती है। या ऐसे चमत्कार जो हमारे बिगड़े काम एक क्षण में पूर्ण कर देते हैं। प्रकृति की अद्भुत रचनाएँ हमें अक्सर अचंबित कर देती हैं। तो क्या आप भी मानते हैं कि ऐसा कुछ तो है जो हमारे साथ है, जो हमें पूर्ण करता है, जो हमें निरंतर सिखाता रहता है। हाँ, कुछ तो है….
कुछ तो है…
उन विशाल सागर की गहराइयों में,
उन समुद्र के विचित्र जीवों में,
उन अनंत जलाशयों के कौतूहल में,
निरंतर तट से टकराती लहरों में,
कुछ तो है।
कुछ तो है…
उन नीले अंबर की ऊंचाइयों में,
उन सफेद बादलों की कतारों में,
उन सूरज की तीव्र किरणों में,
लालिमा का आँचल ओढ़े नभ में,
कुछ तो है।
कुछ तो है…
उन अनकही बातों में,
उन पलों के एहसासों में,
उन बेसब्र नीली आंखों में,
मीठी सी मंद मुस्कुराहटों में,
कुछ तो है।
कुछ तो है…
उन अनदेखी अटूट क्षमताओं में,
उन अंधकार को ध्वस्त करते चिरागों में,
उन इच्छाशक्ति से भरे मन में,
गिर कर फिर से उठ जाने में,
कुछ तो है।
वह कुछ तो है…
अमूल्य, अतुल्य, सबसे परे,
इच्छा, क्रिया, ज्ञान की शक्ति,
पारदर्शी अंतर्मन के समीप,
आत्मविश्वास से अभिपूर्ण,
कुछ तो है,
हाँ, वह कुछ तो है।
जहाँ होनी थी बेफिक्री सी जिंदगी,
वहाँ ठानी कमाने अनमोल रोटी।
जहाँ एक एक पल बिताना था खेल में,
वहाँ झोंक दिया बचपन काम की व्यस्तता में।
जिन हाथों में कलम थी पकड़ानी,
वहाँ इन्होंने पकड़ा दी जीवन की अनगिनत परेशानी।
जहाँ लाड़ के स्वर पड़ने थे कानों में,
वहाँ हर ओर थी डांट डपट की पुकारें।
जहाँ बालपन में करनी थी मासूम गलतियाँ,
वहाँ सुनी अनजानों की कड़वी बोलियाँ।
जहाँ अनगिनत स्वप्न सजाने थे आंखों में,
वहाँ दिखा मुश्किलों का सैलाब रात के अंधेरे में।
कर्म जो इन नन्हे हाथों से करवाए,
वह दूर खड़ा क्यों मुस्कुराए?
नहीं चाहिए इन नन्हे हाथों की कमाई,
जो छीन लेती बचपन की परछाई।
लघु से बचपन के यह कुछ सुनहरे पल,
जी लेने दो इन्हें मस्ती में निश्चल।
बाल श्रम एक ऐसी समस्या है जो देश के उज्जवल भविष्य पर एक ढ़ाल बनकर खड़ी है। जहां बच्चों को अपना बचपन खेलकूद और पढाई में व्यतीत करना चाहिए वहीं कुछ परिवार पेट भरने के लिए उनके नादान कंधों पर काम का बोझ डाल देते हैं। यह कब मजबूरी से लाचारी का रूप ले लेती है, उस परिवार को भी पता नहीं चलता। आक्रोश तब जाग उठता है जब पढ़े लिखे लोग बाल श्रम को बढ़ावा देते हैं उनको नौकरी देकर।
पिछले तीन दशकों में यह स्थापित हो गया है कि बाल श्रम का उन्मूलन किया जा सकता है। हमें केवल मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें हल करने में मदद करने की आवश्यकता है। इस वर्ष की थीम 'सभी के लिए सामाजिक न्याय तथा बाल श्रम का अंत' जैसी मूल समस्याओं पर केंद्रित है जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुशिक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सके। बाल श्रम जैसे अभिशाप को जड़ से समाप्त करने की जागरूकता फैलाने के लिए प्रत्येक वर्ष १२ जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है।
आईये जागरूक बनें और बाल श्रम को जड़ से मिटा दें।