आज उम्मीदों का पिटारा ज़ोर से खनका ,
पहली बार उसे देखा, डगमगाते हुए टिका ।
ज़रा सा सम्भाला परंतु खाली उसे पाया ,
गुम कहां उम्मीदें, सोच मन घबराया ।

हृदय कर रहा तांडव, मचा रहा खूब शोर ,
न सुनता किसीकी चाहे कितना भी दे ज़ोर ।
लडखडाते हुए करता एक ही प्रार्थना बारंबार ,
अधिक जटिल न हो सुनहरी भोर का इन्तज़ार ।

उम्मीदों का पिटारा ummidon ka pitara

कैसे पुनः भर दूँ यह उम्मीदों का पिटारा ,
जब मेरे निकट है न कोई भी सहारा ।
कौन आएगा झोली भर लिए उजियारा ,
हाथ पकड़ मेरा दिखाएगा रोशन किनारा ।

बड़ी राह देख थके चंचल नयन ,
स्वयं करना था अब महत्वपूर्ण चयन ।
दूसरों के काँधे कब तक चढ़ूँगा ,
उम्मीदों की ललक खुद ही खोजूँगा ।

स्वयं हिम्मत बांधे खोजना है वो पथ ,
निराशा, आलस्य त्याग चलना है सामर्थ ।
जीवन में आत्मनिर्भर की डोर अब सांझी ,
संकोच किनारे छोड़, अब आकांक्षाएँ हुई माँझी ।

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समक्ष कठिन पथ अडिग, हौसलाँ हुआ विचलित ,
धैर्य आत्मविश्वास को कर गठरी में एकत्रित ;
तुरंत एक-एक कर आशाएँ आ बैठी सम्मिलित ,
अब उम्मीदों का पिटारा रखना था सुरक्षित ।

सबसे ऊपर जीवन में उनका स्थान चुना ,
हर कार्य अब सुनहरे आँचल में बुना ।
पिटारा अब हो गया चट्टान सा भारी ,
जिसे भरे रखना बनी प्रथम ज़िम्मेदारी ।

हमें किसी भी परिस्थिति में उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। उम्मीदों के पिटारे को भरा रखने के लिए छोटी छोटी चीज़ों में उसे ढूँढ़ते रहें। खनक उस पिटारे की बड़ी मधुर होगी, क्यूँकि उसमें आपकी आशाएँ छुपी होंगी।

आईये देखें अल्पविराम में भी उम्मीद का दीया कैसे जलता रहता है।

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