वानखेड़े स्कोरबोर्ड की आत्मकथा

नमस्कार, मैं हूँ वानखेड़े का स्कोरबोर्ड।
आप मुझे हर कुछ पलों में देखते हैं, पर शायद ही कभी सोचते हैं कि मैं भी कितनी कहानियाँ अपने भीतर सँभाले खड़ा हूँ, धूप, बारिश, शोर, सन्नाटे और इनके बीच बदलते हुए अंक।

एक समय था जब मुझे हाथों से चलाया जाता था। कोई सीढ़ी चढ़कर नंबर पलटता था, एक-एक रन जैसे किसी की उँगलियों से जन्म लेता था। तब हर बदलाव थोड़ा धीमा था, पर उसमें एक ठहराव था जैसे जिंदगी के पुराने दिन, जहाँ सब कुछ जल्दी नहीं, बल्कि धीरे-धीरे समझ में आता था।

आज मैं डिजिटल हो गया हूँ! चमकती रोशनी, तेज़ अपडेट, सब कुछ फटाफट। लोग कहते हैं, “अब तो बहुत स्मार्ट हो गया है स्कोरबोर्ड।”
मैं मुस्कुरा देता हूँ क्योंकि अंदर कहीं वो पुराना मैं अभी भी बैठा है, जो हर अंक को महसूस करता था, सिर्फ दिखाता नहीं था।

वैसे मेरी दुनिया भी बड़ी दिलचस्प है। मैच के बीच-बीच में कबूतर आकर मुझ पर बैठ जाते हैं जैसे उन्हें भी स्कोर जानना हो, या शायद बस थोड़ी देर ऊँचाई से दुनिया देखनी हो। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि वे मुझसे ज्यादा शांत हैं ना उन्हें रन से फर्क पड़ता है, ना विकेट से बस बैठे रहते हैं, जैसे कह रहे हों, “सब चलता रहता है।”

मैंने हर मौसम सहा है तेज़ धूप, जो मेरी स्क्रीन को गर्म कर देती है, बारिश जो सब कुछ धुंधला कर देती है, और वो उमस भरी शामें जब स्टेडियम में सांस लेना भी भारी लगता है। फिर भी मैं वहीं रहता हूँ हर हालत में, हर मैच में जैसे समय, जो कभी रुकता नहीं।

लोग मुझे देखकर अक्सर खुशी या चिंता पढ़ते हैं,
“अरे, स्कोर तो अच्छा है”
“ओह, अभी तो मुश्किल है”
पर सच कहूँ, मैं सिर्फ अंक दिखाता हूँ, कहानी नहीं। कहानी तो उन अंकों के पीछे छुपी होती है मेहनत, उम्मीद, और कभी-कभी एक अधूरी कोशिश।

मुझे याद है एक शाम जब एक खिलाड़ी अपने शतक के करीब था। हर रन के साथ स्टेडियम की आवाज़ बदल रही थी, और मैं बस धीरे-धीरे नंबर बढ़ा रहा था।
90… 95… 99…

उस एक अंक के बढ़ने का इंतज़ार जैसे पूरे मैदान ने एक साथ किया।
और फिर....100

उस पल में जो शोर उठा, वो सिर्फ एक संख्या के लिए नहीं था वो उन सालों के लिए था, जो उस खिलाड़ी ने वहाँ तक पहुँचने में लगाए थे।
मैंने उस दिन सिर्फ “100” नहीं दिखाया, मैंने एक सफर को पूरा होते देखा।

कभी-कभी सोचता हूँ मैं भी शायद जिंदगी के स्कोरबोर्ड जैसा ही हूँ। लोग बस नतीजे देखते हैं कितना पाया, कितना खोया पर उस तक पहुँचने का रास्ता कोई नहीं देखता। मैं सच्चाई दिखाता हूँ, पर पूरी कहानी नहीं।

और शायद यही मेरी सीमा भी है और मेरी खूबसूरती भी। मैच खत्म हो जाते हैं, अंक मिट जाते हैं, पर जो पल बनते हैं वो कहीं न कहीं रह जाते हैं।

मैं हर दिन फिर से तैयार हो जाता हूँ नई कहानी लिखने के लिए, नई उम्मीदों के साथ, नए अंकों के साथ।

और आप,
आप फिर से मेरी ओर देखेंगे, जैसे हर बार देखते हैं, कुछ जानने के लिए, और शायद थोड़ा महसूस करने के लिए।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

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