लाल आम, पीला तरबूज़

MeenalSonal
Tue 04, 2026

किरण भागता-भागता घर आया और अपनी माँ की ओर आश्रय से देखने लगा, जैसे कुछ बताना चाहता हो। "क्या हुआ मेरे राजा बेटे को", पूछती हुई सुनीता आटा लगाने लगी और उसी में कल की बची हुई सब्जी डाल दी।

किरण ने झट से अपने स्कूल के बस्ते से एक नई किताब निकाली। किरण आगे से कुछ बोलता उससे पहले सुनीता बोल उठी “ये कहां से मिली तुझे? कोई बड़े लोग आए थे क्या? या किसी का जन्मदिन वहां मनाया गया?”।
किरण मुंह ताकता रह गया, कि मां को तो सब पता होता है, बिना मेरे बोले वो सब कुछ जान गई कि आज तीन बड़ी कारें आई थी और हमें किताबें, पेंसिल और अच्छा खाना खाने को मिला।

“हां मां, आज मेरी ही उम्र का लड़का वहां आया था लाल गाड़ी में बैठ कर। और पता है सबसे मज़े की बात उसका नाम भी किरण है।”

सुनीता अपने बेटे की आँखों में ख़ुशी और सवाल एक साथ पढ़ पा रही थी। अभी कुछ दिन पहले ही तो उसने अपनी पड़ोसन की मदद से किरण का सरकारी स्कूल में दाखिला करवाया था।

वैसे तो किरण को एक साल पहले ही पाँच साल की आयु में स्कूल जाना शुरू कर देना चाहिए था पर वह दो साल देरी से स्कूल गया था, इसके पीछे कारण तो वैसे कई हैं पर आज तक सुनीता अपने पति के व्यवहार को ही मुख्य कारण समझती है। सुनीता का पति काम पर जाता, कमता, फिर रात को सीधे शराब के ठेके पर अपनी कमाई को उड़ा देता, कभी बचे हुए कुछ रुपये लाकर सुनीता के हाथ में रख देता तो कभी गाल पर ज़ोर से एक थप्पड़ जड़ देता, जिसका कारण सुनीता आज तक नहीं समझ पाई थी। जब एक साल पहले वह मर गया तो सुनीता ने हिम्मत बांधी और काम करना शुरू किया और ठाना कि किरण को ऐसी सीख मिलेगी कि वह हर काम समझदारी से करेगा।

किरण अपनी मां का ​​ध्यान अपनी और खींचता हुआ बोला, "मां देखो तो सही जो मेरी नई पुस्तक में यहां आम का रंग कितना पीला है और देखो ये तरबूज अंदर से कितना लाल है। पर हम तो जो आम लाते हैं वे तो अंदर से लाल और काले होते हैं और तरबूज़ पीले। ये किरण की मासूमियत ही थी जो अपनी मां को फलों के रंग समझा रहा था।

सुनीता भी पूरे ध्यान से किरण की बातें सुन रही थी।

किरण ने बड़े उत्साह से खाने में क्या-क्या खाया यह बताया और बड़ी सी चॉकलेट भी दिखाई। जब सुनीता ने पूछा ये स्कूल में क्यों नहीं खाई तो बड़े प्यार से मां को स्नेहमय अलंगिन करके बोला मां तेरे साथ जो खानी थी और फिर बोल उठा…मां परांठे रात को खा लूंगा और बैठ गया नई किताब पढ़ने।

किरण ने पूरे दिन का वर्णन किया, एक बार भी अपनी माँ से यह प्रश्न नहीं किया कि माँ हम ऐसे क्यों रहते हैं और हमारे पास कब सब कुछ होगा क्योंकि सुनीता ने उसे यह सिखाया था कि जितना है उतने में खुश रहना चाहिए।

अपनी मनोस्थिति का ही आसरा था सुनीता के पास जिसका उपयोग उसे जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति दे रहा है और वही सकारात्मक मनोस्थिति सुनीता अपने बेटे में आत्मसात कर रही थी।

और दूसरी ओर जो किरण का परिवार उसको जन्म दिन पर सरकारी स्कूल लाए थे वो अपने बच्चे में कृतज्ञता और सद्भावना को आत्मसात करने आए थे।

सच्ची खुशी संतोष, कृतज्ञता और सकारात्मक सोच में होती है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद सही परवरिश बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की नींव रखती है। हम बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य (हॉलिस्टिक वैलनेस) जैसे गुण बचपन से उनके मन में एकाग्र कर सकते हैं। फिर चाहे आम पीला हो या लाल, स्वाद आपके मन से आएगा।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

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