डमरू की गूंज

MeenalSonal
Sat 04, 2026

आत्मविश्वास, एकाग्रता और सकारात्मक सोच से हम अपनी कमजोरियों को ताकत में बदल सकते हैं। कभी-कभी बाहरी प्रेरणा या आस्था हमें अंदर से मजबूत बनाती है, लेकिन असली बदलाव हमारे अपने प्रयास और समर्पण से ही आता है।

ऋषिकेश के शिव नगर की छोटी-सी गली में तीसरा मकान गोलू की वजह से काफी मशहूर था। गोलू, नाम से ही लगता है न, एक प्यारा-सा, गोल-मटोल बच्चा। घर का लाड़ला भी था, लेकिन थोड़ी शरारतें करना उसकी आदत में शामिल था। वैसे तो वह अपने सारे काम ठीक से करता था, पर भूगोल उसका कमजोर विषय था।

सातवीं कक्षा में उसके टीचर ने साफ कह दिया था, "आपका बेटा पढ़ाई तो ठीक-ठाक कर लेता है, लेकिन आगे बढ़ने के लिए हर विषय में पास होना जरूरी है। मैंने जैसे-तैसे इसे आठवीं में पहुंचा दिया, पर आगे दसवीं भी तो है…”

यह बात पूरे परिवार के लिए चिंता का विषय बन गई, माँ, बाबा, काका और काकी सबके लिए। क्योंकि छोटी बहन गुड्डी भी तो बड़े भाई के रास्ते पर ही चलने वाली थी।

आठवीं में पहुँचते ही गोलू ने मन ही मन एक संकल्प लिया, “अब मैं भूगोल में अव्वल आकर दिखाऊँगा!”

पहली परीक्षा का समय आया। गोलू ने जैसे-तैसे किताब खोली, पहले चैप्टर का नाम था, “भारत के भव्य पर्वत”।

काकी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, यह तो बहुत आसान है!”

गोलू ने हैरानी से पूछा, “कैसे आसान है?”

काकी बोली, “अपने आस-पास देखो बेटा। मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलो। तुम ऋषिकेश में रहते हो, ये पहाड़, इनकी कहानियाँ, इनकी ऊँचाइयाँ… बचपन से हम सुनते आए हैं। कहते हैं, भोले बाबा का वास इन पर्वतों में है। और उनके डमरू की गूंज आज भी सच्चे भक्तों को सुनाई देती है…”

इतना कहते ही अचानक बाहर से डमरू की आवाज सुनाई दी। एक खिलौने वाला अपना ठेला लेकर गली से गुजर रहा था।

काकी तो अपने काम में लग गईं, लेकिन गोलू के मन में “डमरू” वाली बात घर कर गई।

अब जब भी वह उस चैप्टर को खोलता, कभी दूर से, कभी पास से उसे डमरू की आवाज़ सुनाई देती। कभी बच्चे खेलते हुए बजा देते, तो कभी गुड्डी ही शरारत में डमरू बजा देती।

एक दिन वह भागता हुआ माँ के पास गया, “माँ, क्या भोले बाबा सच में कैलाश में रहते हैं? क्या वे इन पहाड़ों में आते-जाते हैं?”

माँ ने काम करते-करते कहा, “बाबा तो हर जगह हैं, हमारे घर में, हमारे मन में…”

गोलू ने फिर पूछा, “नहीं माँ, सच-सच बताओ, आपको क्या लगता है?”

माँ ने सहज भाव से कहा, “यही कि उनका वास हर जगह है।”

माँ फिर काम में लग गईं, और गोलू को एक बार फिर पढ़ाई से दूर सोचने का बहाना मिल गया।

लेकिन उस रात कुछ अजीब हुआ।

गोलू को फिर से डमरू की गूंज सुनाई दी। वह उठकर खिड़की के पास गया, बाहर कोई नहीं था। गुड्डी भी गहरी नींद में सो रही थी। उसके विचलित मन में एक अजीब सी शांति छा गई। वह अपनी टेबल के पास आया, भूगोल की किताब उठाई और पूरे मन से उस चैप्टर को पढ़ने लगा। गोलू को सब कुछ आसानी से समझ भी आ गया और याद भी हो गया।

एक हफ्ते बाद जब परीक्षा के परिणाम आए, तो सब आश्चर्यचकित रह गए। गोलू ने भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए थे।

टीचर भी हैरान थे, “लगता है गोलू सच में बदल गया है!”

माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह तो भोले बाबा की कृपा है।”

उसी समय फिर से डमरू की आवाज़ सुनाई दी।

गुड्डी दौड़ती हुई आई, “भैया! तुम पास हो गए! अब तो टॉफी मिलेगी!”

गोलू मन ही मन सोचने लगा, “उस रात डमरू किसने बजाया था? क्या भोले बाबा मुझे कोई संकेत दे रहे थे?
क्या वे सच में हैं… और क्या उनकी नजर मुझ पर पड़ी है? क्या मैं खास हूँ?
क्या मुझे माँ को उस रात की बात बतानी चाहिए…? और अगर बताऊँ, तो क्या कोई यकीन करेगा?”

डमरू की वह गूंज अब सिर्फ एक आवाज नहीं थी, वह गोलू के आत्मविश्वास और विश्वास की कहानी बन चुकी थी।

This post is a part of BlogchatterA2Z Challenge 2026

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2 comments on “डमरू की गूंज”

  1. A very interesting story MeenalSonal. Sometimes our inner confidence needs damru to be woken up!
    p.s. Sorry for writing comment.

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